Friday, September 14, 2012

दिल ही दिल में

दिल ही दिल में ख़त्म होकर धड़कनें रह जाएँगी
वो न आएँगे तो मिटकर चाहतें रह जाएँगी

सब जुदा हो जायेंगे एक मोड़ आ जाने के बाद
ख़्वाब आँखों से छिलेंगे सूरत रह जाएँगी

वो चले जायेंगे मेरी मंज़िलों से भी परे
मेरे सन्नाटें में उनकी आहटें रह जाएँगी

कुछ उदासी और मिल जाएगी मिलकर आपसे
सामना हो जायेगा पर हसरतें रह जाएँगी

हम चराग-ए-अंजुमन बनकर सुलगते जायेंगे
याद कुछ बीतें दिनों की महफिलें रह जाएँगी

Tuesday, August 21, 2012

तेरे क़रिब

तेरे क़रिब रहूँ या के दूर जाऊं मैं
हैं दिल का एक ही आलम तुझ ही को चाहूँ मैं

मैं जानता हूँ वो रखता है चाहतें कितनी
मगर ये बात उसे किस तरह बताऊँ मैं

जो चुप रहा तो वो समझेगा बदगुमान मुझे
बुरा भला ही सही कुछ तो बोल आऊं मैं

फिर इसके बाद ताल्लुक में फ़ासले होंगे
मुझे संभाल के रखना बिछड़ ना जाऊं मैं

मोहब्बतों की परख का यहीं तो रस्ता है
तेरी तलाश में निकलूं तुझे ना पाऊं मैं

Monday, July 16, 2012

क्या है..

अपनी   तस्वीर  को  आँखों  से  लगाता  क्या  है
इक  नज़र  मेरी  तरफ  देख  तेरा  जाता  क्या  है
 
 मेरी  रुसवाई  में  वो  भी  है  बराबर  के  शरीक़
मेरे  किस्से  मेरे  यारों  को  सुनाता  क्या  है
 
 पास  रह  कर  भी  ना  पहचान  सका  तू  मुझ  को 
दूर  से  देख  कर  अब  हाथ  हिलाता  क्या  है
 
 उम्र  भर  अपने  गिरेबाँ  से  उलझने  वाले 
तू  मुझे  मेरे  ही  साये  से  डराता  क्या  है
 
 मैं  तेरा  कुछ  भी  नहीं  हूँ  मगर  इतना  तो  बता 
देख  कर  मुझ  को  तेरे  ज़ेहन  में  आता  क्या  है
 


सफ़र- ए- शौक़  मैं  क्यूँ  काँपते  पाँव  तेरे 
दूर  से  देख  के  अब  हाथ  उठाता  क्या  है
 



मर  गए  प्यास  के  मारे  तो  उठा  अब्र- ए- करम 
बुझ  गयी  बज़्म  तो  अब  शम्मा  जलाता  क्या  है 
 
  शहजाद  अहमद 

Monday, July 2, 2012

कब ख्याल आपका नहीं होता
दर्द दिल से जुदा नहीं होता

हाल-ए-दिल किस तरह लिखूं उनको
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

दिल ने कुछ उनसे कह दिया होगा
बेवजह वो खफा नहीं होता

वो खफा होते है तो होने दो
वो किसीका खुदा नहीं होता

Wednesday, June 20, 2012

बरसों में..

गले लगा है वो मस्ते शबाब बरसों में
हुआ है दिल को सुरुरे शराब बरसों में

खुदा करे के मजा इन्तजार का न मिटे
मेरे सवाल का वो दे जवाब बरसों में

बचेंगे हज़रते जाहिद कहीं बगैर पिए 
हमारे हाथ लगे है जनाब बरसों में

न क्यूँ हो नाज मुझे अपने दिल पे ओ जालिम
किया है तु ने मुझे इन्तखाब बरसों में

वो ग़ोले दाग सूरत को हम तरसते हैं
मिला है आज वो खाना-ख़राब बरसों में

Friday, June 15, 2012

ये क्या जाने में जाना है जाते हो खफा हो कर 
मैं जब जानूं मेरे दिल से चले जाओ जुदा हो कर
                                                                                         
क़यामत तक उडेगी दिल से उठकर खाक आंखों तक 
इसी रस्ते गया है हसरतों का काफिला हो कर
                                                                                         
तुम्ही अब दर्द-ए-दिल के नाम से घबराए जाते हो
तुम्ही तो दिल में शायद आए थे दर्द-ए-आशियाँ हो कर
                                                                                         
यूं ही हमदम घड़ी भर को मिला करते थे बेहतर था
के दोनों वक्त जैसे रोज़ मिलते हैं जुदा हो कर 
                                                                                       

- सीमाब अकबराबादी

Friday, June 8, 2012

क्या खबर थी....

क्या खबर थी के मैं इस दर्ज़ा बदल जाऊंगा
तुझको खो दूँगा तेरे ग़म से संभल जाऊंगा


अजनबी बनके मिलूँगा मैं तुझे महफ़िल में
तुने छेड़ी भी तो मैं बात बदल जाऊंगा


ढूंढ़ पाए ना जहाँ याद भी तेरी मुझको
ऐसे जंगल में किसी रोज निकल जाऊंगा


जिद में आए हुए मासूम बच्चे की तरह
खुद ही कश्ती को डूबोने पे मचल जाऊंगा

Monday, May 28, 2012

रोया करेंगे..

रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
अटका कहीं जो आप का दिल भी मेरी तरह

ना ताब हिज्र में है ना आराम वस्ल में
कमबख्त दिल को चैन नहीं है किसी तरह

गर चुप रहें तो गमे हिज्राँ से छूट जाएँ
कहते तो हैं भले की वो लेकिन बुरी तरह

न जाए वहां बने है न बिन जाए चैन है
क्या कीजिए हमें तो है मुश्किल सभी तरह

हूँ जाँ बलब बुताने सितमगर के हाथ से
क्या सब जहाँ में जीते हैं मोमिन इसी तरह 

                     - मोमिन खान

Friday, April 20, 2012

टूटे हुए..

टूटे हुए ख़्वाबों के लिए आँख ये तर्र क्यूँ
सोचो तो सही शाम है अंजामे सहर क्यूँ

जो ताज सजाए हुए फिरता हूँ अनाकर 
हालात के कदमों पे झुकेगा वहीँ सर क्यूँ

सिलते ही तो सिल जाए किसी ए फ़िक्र लबोंकी  
खुश रंग अंधेरों को कहूँगा मैं सहर क्यूँ
   
सोचा किया मैं हिज्र की दहलीज पे बैठा
सदियों में उतर जाता हैं लम्हों का सफ़र क्यूँ

हरजाई ए शहजाद ये तसलीन पछाना
सोचा भी कभी तुमने हुआ ऐसा मगर क्यूँ

Tuesday, April 10, 2012

उसने जब  मुझसे किया एहदे वफ़ा आहिस्ता

दिल की वीराने में एक फुल खिला आहिस्ता

Tuesday, March 27, 2012

कोई...

कोई समझाए ये क्या रंग है मयखाने का
आँख साक़ी की उठे और नाम हो पैमाने का

गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालो
रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का

चश्मे-साकी मुझे हर गाम पे याद आती है
रास्ता भूल न जाऊं कहीं मयखाने का

अब तो हर शाम गुज़रती है इसी कूचे में
ये नतीज़ा हुआ नासेह तेरे समझाने का

मंजिल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसाँ 'इकबाल'
इश्क है नाम ख़ुद अपने पे गुज़र जाने का 

- इकबाल

Thursday, March 1, 2012

पुछा  किसी  ने  हाल  किसी  का  तो  रो  दिए
पानी  में  अक्स  चाँद  का  देखा  तो  रो  दिए

नग़मा  किसी  ने  साज़  पर  छेड़ा  तो  रो  दिए
घुंचा  किसी  ने  शाख  से  तोड़ा  तो  रो  दिए

उड़ता  हुवा  ग़ुबार  सर -ए -राह  देख  कर
अंजाम  हम  ने  इश्क  का  सोचा  तो  रो  दिए

बादल  फिजा  में  आप  की  तस्वीर  बन  गई
साया  कोई  खयाल  से  गुज़रा  तो  रो  दिए

रंग -ए -शफक  से  आग  शागुफों  में  लग  गई
सगहर  हमारे  हाथ  से  छलका  तो  रो  दिए

Thursday, February 23, 2012

इक लफ्ज़े मोहब्बत

इक लफ्ज़े मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिले आशिक़ फैले तो ज़माना  है

आँखों में नमी सी है चुप चुप से वो बैठे है
नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है

यह इश्क नहीं आसान इतना ही समझ लीजिए
इक आग का दरिया और डूब के जाना है

दिल संगे मलामत का हर चंद निशाना है
दिल फिर भी मेरा दिल है दिल ही तो ज़माना है

आंसू तो बहोत से हैं आँखों में जिगर लेकिन
बिंध जाये तो मोती है रह जाये तो दाना है

- जिगर मुरादाबादी
 

Tuesday, February 21, 2012

दिन में


दिन में कब सोचा करते थे सोंएँ गए हम रात कहाँ
अब ऐसे आवारा घूमें अपने वो हालात कहाँ


    कब थे तेज़-रवी पर नादान अब मंजिल पर तनहा हैं
    सोच रहे हैं इन हाथों से छूता था वो हाथ कहाँ 

 

 क्या तुम ने उनको देखा है क्या उनसे बातें की हैं      
तुमको क्या समझाएँ यारो खाई हम ने मात कहाँ      


बरसो बाद मिले हम उनसे दोनों थे शर्मिंदा से
दोनों ने चाहा भी लेकिन फिर आती वो बात कहाँ 


Wednesday, February 15, 2012

चाहतें तेरी न समझी जाए
आहटें यूँ खुद ही भरी जाए

गैर जो समझा मुझे आखिर 
मुस्कुराहटें तो बिखरी जाए

सादगी भरे लम्हें बस तेरे
जर्रे जर्रे में से बेबसी जाए

परेशां हर लोग जिंदगी के
रुकने जाए तो जिंदगी जाए 

Friday, January 27, 2012

देख तो...

देख तो दिल के जाँ से उठता है 
यह धुआं सा कहाँ से उठता है 


गोर किस दिल जले की है यह फलक 
शोला एक सुबह याँ से उठता है


बैठने कौन दे हैं फिर उसको
जो तेरे आस्ताँ से उठता है


यूँ उठे आह उस गली से हम 
जैसे कोई जहां से उठता है 


इश्क एक मीर भारी पत्थर है 
बोज़ कब नातवाँ से उठता है

-मीर

Tuesday, January 3, 2012

वोह तो न मिल सकें..

वोह तो न मिल सकें हमें रुसवाइयाँ मिली
लेकिन हमारे इश्क को रानाइयां मिली


आँखों में उनकी डूब के देखा है बारहां
जिनकी थी आरजू न वो गहराइयाँ मिली


आइना रख के सामने आवाज दी उसे
उसके बगर जब मुझे तन्हाईयाँ मिली


आए थे वो नजर मुझे फूलों के आसपास
देखा करीब जाके तो परछाइयाँ मिली


पूछा जो दिल की मैंने तबाही का माजरा
हसकर जवाब दे मुझे अंगड़ाइयां मिली


नासिर दिल-ऐ-तबाह न उनको दिखा सदा
मिलने को बारहां उसे तन्हाईयाँ मिली


                            - नासिर

Sunday, January 1, 2012

ज़िन्दगी यूँ थी के..

ज़िन्दगी यूँ थी के जीने का बहाना तू था
हम फ़क़त ज़ेब-ए-हिकायत थे, फ़साना तू था


हम ने जिस जिस को भी चाहा तेरे हिज्राँ में, वो लोग 
आते जाते हुए मौसम थे, ज़माना तू था


अब के कुछ दिल ही ना माना के पलट कर आते
वरना हम दर-ब-दरों का तो ठिकाना तू था


यार-ओ-अगयार के हाथों में कमानें थें फ़राज़
और सब देख रहे थे के निशाना तू था


अहमद  फ़राज़

Tuesday, December 27, 2011

आपको..

आपको  भूल  जाए  हम  इतने  तो  बेवफ़ा  नहीं
आपसे  क्या  गिला  करे  आपसे  कुछ  गिला  नहीं

शीशा -ए -दिल  को  तोड़ना  उनका  तो  एक  खेल  है
हमसे  ही  भूल  हो  गयी  उनकी  कोई  ख़ता  नहीं

काश  वो  अपने  ग़म  मुझे  दे  दे  तो  कुछ  सुकूँ  मिले
वो  कितना  बदनसीब  है  ग़म  भी  जिसे  मिला  नहीं

जुर्म  है  गर -वफ़ा  तो  क्या  क्यों  मैं  वफ़ा  को  छोड़  दू
कहते  हैं  इस  गुनाह  की  होती  कोई  सज़ा  नहीं

Monday, December 26, 2011

हस्ती अपनी..

हस्ती अपनी हबाब की सी है
यह नुमाइश सराब की सी है

नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिये
पंखड़ी इक गुलाब की सी है

मैं जो बोला कहा की यह आवाज़
उसी ख़ाना ख़राब की सी है

बार बार उसके दर पे जाता हूँ
हालत अब इज़तिराब की सी है

मीर उन नीम बाज़ आंखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

- मीर तक़ी मीर

Monday, November 28, 2011

आँखों में जल रहा है..

आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ

चूल्हें नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ

आँखों के पोछने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं 
मेहमान ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

- गुलज़ार
 

जगजीत सिंग

जिंदगी यूँ हुई बसर तनहा
काफिला साथ और सफ़र तनहा

अपने साये से चौंक जाते है
उम्र गुजरी है इस कदर तनहा

रात भर बोलते है सन्नाटे
रात कांटे कोई किधर तनहा

दिन गुजरता नहीं है लोगो में
रात होती नहीं बसर तनहा

हम ने दरवाज़े तक तो देखा था 
फिर न जाने गए किधर तनहा

- गुलज़ार

अब और..

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाये हम
ये भी बहोत है तुझको अगर भूल जाये हम

इस जिंदगी में इतनी फ़रागत किसे नसीब
इतना ना याद आ के तुझे भूल जाये हम

तू इतनी दिलज़दा तो न थी ए शब्-ए-फिराक
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाये हम

वो लोग अब कहाँ है जो कहते थे कल फराज
ये ए खुदा ना कर तुझको भी रुलाये हम

- अहमद फ़राज़

Friday, October 14, 2011

यह आलम...

यह आलम शौक का देखा ना जाए
वोह बुत है या खुदा देखा ना जाए

यह किन नज़रों से तुमने आज देखा
के तेरा देखना देखा ना जाए

हमेशा के लिए मुझसे बिछड़ जा
यह मंज़र बारहां देखा न जाए 

गलत है जो सुना पर आजमा कर
तुझे ऐ बावफा देखा ना जाए

यह महरूमी नहीं पास-ऐ-वफ़ा है
कोई तेरे सिवा देखा ना जाए

फ़राज़ अपने सिवा है कौन तेरा
तुझे तुझसे जुदा देखा ना जाये

- अहमद फ़राज़

वो  कोई  और  न  था  चंद  खुश्क  पत्ते  थे
शज़र  से  टूट  के  जो  फ़स्ल-ए-गुल  पे  रोए  थे

अभी  अभी  तुम्हें  सोचा  तो  कुछ  न  याद  आया
अभी  अभी  तो  हम  एक -दुसरे  से  बिछड़े   थे

तुम्हारे  बाद  चमन  पर  जब  इक  नज़र  डाली
कलि  कलि  में  खिज़ां  के  चिराग  जलते  थे

तमाम  उम्र  वफ़ा  के  गुनाहगार  रहे
ये  और  बात  की  हम  आदमी  तो  अच्छे  थे

शब् -ए -खामोश  को  तनहाई  ने  ज़बान  दे  दी
पहाड़  गूंजते  थे  दश्त  सनसनाते  थे 

वो  एक  बार  मरे  जिन  को  था  हयात  से  प्यार
जो  ज़िन्दगी  से  गुरेज़ाँ  थे  रोज़  मरते  थे 

नए  ख्याल  अब  आते  हैं  ढल  के  ज़हन  मैं
हमारे  दिल  मैं  कभी  खेत  लहलहाते  थे 

ये  इरतिका  का  चलन  है  के  हर  ज़माने  में
पुराने  लोग  नए  आदमी  से  डरते  थे 

नदीम  जो  भी  मुलाक़ात  थी  अधूरी  थी
के  एक  चेहरे  के  पीछे  हज़ार  चेहरे  थे

Thursday, September 22, 2011

ले चला..

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से बेहतर था न आना तेरा

तू जो ऐ जुल्फ परेशान रहा करती है
किसके उजड़े हुए दिल में ठिकाना तेरा

आरजू ही न रहीं सुबह ऐ वतन की मुझको
शाम ऐ ग़ुरबत है अजब वक़्त सुहाना तेरा

अपनी आँखों में अभी कौंध गयी बिजली सी
हम न समझे के यह आना है के जाना तेरा

- दाग देहलवी

Sunday, September 11, 2011

मुद्दतों हम पे गम उठाये हैं 
तब कहीं जाके मुस्कराए हैं
एक निगाह-ए-खुलूस के खातिर 
जिंदगी भर फरेब खाए हैं

मुझे फिर वही याद आने लगे है
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे है

सुना है हमें वो बुलाने लगे है
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे है

यह कहना है उनसे मोहब्बत है मुझको
यह कहने में उनसे ज़माने लगे है

क़यामत यक़ीनन करीब आ गयी है
खुमार अब तो मस्जिद में जाने लगे है

Thursday, September 8, 2011

राज़ की बातें

राज़ की बातें लिखी और ख़त खुला रहने दिया
जाने क्यूँ रुसवाईओं का सिलसिला रहने दिया

उम्र भर मेरे साथ रहकर वो ना समजा दिल की बात
दो दिलों के दरमियाँ इक फ़ासला रहने दिया

अपनी फ़ितरत बदल पाया न इसके बावजूद
खत्म की रंजिश मगर फिर भी गिला रहने दिया

मैं समज़ता था ख़ुशी देगी मुझे सबीर-ए-फरेब
इसलिए मैं ने ग़मों से राबिता रहने दिया


- सबीर जलालाबादी

Tuesday, September 6, 2011

हिज्र की रात का अंजाम तो प्यारा निकला..
वो ही सूरज के जो डूबा था दोबारा निकला..

वक़्त ने जब भी मेरे हाथ से मिस्हल छिनी
ज़हन में तेरे तसव्वुर का सितारा निकला..

मैं तेरे क़ुर्ब से डरता हूँ के तू जिन्दा रहें
मैं समन्दर में जब उतरा तो किनारा निकला..

तू के था बज़्म में तस्वीर कहाँ भेजी थी 
मेरी तन्हाई में क्यूँ अंजुमन आरा निकला..

जुल्मते शब ने किया जिनका तसव्वुर मुमकिन
यह अँधेरा तो उजाले का सहारा निकला..


Monday, August 15, 2011

शहजाद

गुल  खिले  चाँद  रात  याद  आई 
आपकी  बात  बात  याद  आई

एक  कहानी  की  हो  गयी  तकमील 
एक  सावन  की  रात  याद  आई

अश्क  आँखों  में  फिर  उमड़  आये 
कोई  माज़ी  की  बात  याद  आई

उनकी  महफ़िल  से  लौट  कर  'शहजाद'
रौनक -ए -कायनात  याद  आई

Friday, August 12, 2011

गम-ए-इंतजार में इंतजार क्या करूँ
ये वस्ल-ए-रात में इकरार क्या करूँ

कोशिश की राहों में बसाया घर मैं ने
आ के पास तेरे मैं इज़हार क्या करूँ


Wednesday, August 10, 2011

कोई..

ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई
इसलिए रूठ रहे हैं कि मनाए कोई

ये न पूछो कि ग़मे-हिज्र में कैसी गुज़री
दिल दिखाने का हो तो दिखाए कोई

हो चुका ऐश का जलसा तो मुझे ख़त पहुँचा
आपकी तरह से मेहमान बुलाए कोई

तर्के-बेदाद की तुम दाद न पाओ मुझसे
करके एहसान न एहसान जताए कोई

क्यों वो मय-दाख़िल-ए-दावत ही नहीं ऐ वाइज़
मेहरबानी से बुलाकर जो पिलाए कोई

सर्द मेहरी से ज़माने के हुआ है दिल सर्द
रखकर इस चीज़ को क्या आग लगाए कोई

आप ने दाग़ को मुँह भी न लगाया अफ़सोस
उसको रखता था कलेजे से लगाए कोई


- दाग देहलवी

Monday, August 8, 2011

चला गया ...

दयार-ए-दिल की रात में चराग सा जला गया 
मिला नहीं तो किया हुआ वो शक्ल तो दिखा गया

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिया
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

यह सुबहओं की सफेदिया यह दोपहर की जर्दिया
अब आईने में देखता हूँ में कहाँ चला गया  

वो दोस्ती तो खैर अब नसीब-ए-दुश्मन हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया 

यह किस खुशी की रीत पर ग़मों को नींद आ गई
वोह लहर किस तरफ गई यह में कहाँ समां गया

Wednesday, July 27, 2011

गुलों में रंग भरे, बादे-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहरे-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंजे-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सरे-काकुल से मुश्के-बार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शबे-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले

हुज़ूरे-ए-यार हुई दफ़्तरे-जुनूँ की तलब
गिरह में लेके गरेबाँ का तार तार चले

मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले 



- फैज़

Tuesday, July 5, 2011

मोहसीन नक़वी

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचोमें गुम रहते हो

तेज हवा ने मुझसे पूछा
रेत पे क्या लिखते रहते हो


कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो

हमसे ना पूछो हिज्र के किस्से
अपनी कहो अब तुम कैसे हो

- मोहसीन नक़वी

Wednesday, June 22, 2011

आखिर कब तक..

झूटी सच्ची आस पे जीना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..
मय की जगह खून-ए-दिल पीना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे..
तूफानों की जद पे सफिना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

एक महीने के वादे पर साल गुजरा फिर भी ना आये..
वादे का ये एक महिना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

सामने दुनिया भर के गम है और इधर इक तनहा हम है..
सैकड़ों पत्थर इक आइना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

Sunday, May 29, 2011

सांवरे तोरे बिन जिया जाए ना..
  सांवरे तोरे बिन जिया जाए ना.. जलूं तेरे प्यार में करूँ इंतज़ार तेरा.. किसी से कहाँ जाए ना... 
  याद तिहारी मोरा मन तडपाए सारी रैना नींद ना आए..
  बिरहाकी मारी देखूं राह निहारें दो नैनों के दीप जलाए..जलूं तेरे प्यार में करूँ इंतज़ार तेरा.. किसी से कहाँ जाए ना... 
  सांवरे तोरे बिन जिया जाए ना..
  डूब चलें मेरी आस के तारें कैसे पहुचूँ पी के द्वारें टूट गएँ सब संग सहारें डोले नैयाँ दूर किनारें..जलूं तेरे प्यार में करूँ इंतज़ार तेरा.. किसी से कहाँ जाए ना... 
  सांवरे तोरे बिन जिया जाए ना..

Wednesday, May 11, 2011

जलवा ब कद्र ए ज़र्फ़ ए नज़र देखते रहे
क्या देखते हम उनको मगर देखते रहे

अपना ही अक्स पेश ए नज़र देखते रहे
आइना रु ब रु था जिधर देखते रहे

उनकी हरीम ए नाज़ कहाँ और हम कहाँ
नक्श ओ निगार ए पर्दा ए दर देखते रहे

ऐसी भी कुछ फ़िराक की रातें गुज़र गयीं
जैसे उन्ही को पेश ए नज़र देखते रहे

हर लहजा शान ए हुस्न बदलती रही जिगर
हर आन हम जहाँ ए दीगर देखते रहे

Thursday, April 28, 2011

जिंदगी से...

जिंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहोत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं
एक मुसाफिर भी काफ़िला है मुझे

दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाइश थी आबला है मुझे

लब कुषा हूँ तो इस यकीन के साथ
क़त्ल होने का हौसला है मुझे

कौन जाने के चाहतो में 'फ़राज़'
क्या गवायाँ क्या मिला है मुझे

- अहमद फ़राज़

Tuesday, April 26, 2011

नजर मिला के मेरे पास आ के लूट लिया
नजर हटी थी के फिर मुस्कुरा के लूट लिया

दुहाई है मेरे अलाह की दुहाई है 
किसी ने मुझ से मुझी को छुपा के लूट लिया

सलाम उस पे के जिस ने उठा के पर्दा-ए-दिल
मुझी में रह के मुझी में समां के लूट लिया

यहाँ तो खुद तेरी हस्ती है इश्क को दरकार
वो और होंगे जिन्हें मुस्कुरा के लूट लिया

निगाह डाल दी जिस पर हसीं आँखों ने
उसे भी हुस्न-ए-मुजस्सम बना के लूट लिया
  

- जिगर मुरादाबादी

Thursday, April 21, 2011

फिर....

फिर  उसी  राह  गुज़र  कर  शायद
हम  कभी  मिल  सकें  मगर  शायद

जान  पहचान  से  क्या  होगा
फिर  भी  ऐ  दोस्त  गौर  कर  शायद

मुन्तजिर  जिनके  हम  रहे  उनको
मिल  गए  और  हम  सफ़र  शायद

जो  भी  बिछड़े  हैं  कब  मिले  हैं  'फ़राज़'
फिर  भी  तू  इंतज़ार  कर  शायद

- अहमद  फ़राज़

Tuesday, April 19, 2011

यार आए न आए...

खुदा ही जाने यार आए न आए
मेरे दिल को करार आए न आए

जवानी में अगर तोबा भी कर ले
किसी को इतबार आए न आए

वो आए भी तो अब शिद्दत-ए-दर्द
खुदा जाने करार आए न आ

इबादत तो है पीरी में भी मुमकिन
जवानी बार बार आए न आए

Wednesday, April 6, 2011

तू क्या है

हर एक बात पे कहते हो तुम के 'तू क्या है'
तुम ही कहो के यह अंदाजे-गुफ्तगू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख़ जुस्तजू क्या है

न शोलें में यह करिश्मा न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वोह शोखे -तुन्द खू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

रही न ताक़ते-गुफ्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

वोह चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बाड़े -गुल फामे-मुश्कबू  क्या  है

यह रश्क है के वो होता है हम सुखन तुमसे
वगरना खौफे-बाद आमोज़ी-ए-अदू क्या है

हुआ है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है

-ग़ालिब

Sunday, March 20, 2011

नमी सी है..

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है

दफ्न कर दो हमें के साँस मिले
नब्ज कुछ देर से थमी सी है

वक़्त रहता नहीं कही टिककर
इसकी आदत भी आदमी सी है

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्वीर लाजमी सी है

Sunday, February 20, 2011

अतहर नफीस

ना उड़ा यूँ ठोकरों से मेरी खाक-ए-कब्र जालिम
यही एक रह गयी है मेरे प्यार की निशानी

तुझे पहली ही कहा था हैं जहाँ सराह-ए-फ़ानी
दिल-ए-बदनसीब तुने मेरी बात ही न मानी

सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं


कभी कहाँ ना किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को

सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा दूँ गरीब खाने को

जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का हैं जिसमें अब ज़िंदा हूँ मैं

मेरे होंठो का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तुने मुझको बाग जाना देख ले सेहरा हूँ मैं

देखिए मेरी पजीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त की दहलीज़ पर आया हूँ मैं


इसका रोना नहीं क्यूँ तुम ने किया दिल बरबाद
इस का गम है के बहोत देर में बरबाद किया

मुझ को तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद
लोग कहते के तुम ने मुझे बरबाद किया 

- अतहर नफीस

Wednesday, January 26, 2011

दिल से दुआ मुझे दे के तो देखो
आज आंसू मेरे गिरा के तो देखो

मेरी परछाई मेरे गम की स्याही
इस अँधेरे को उतार के तो देखो

मस्ती भरे पल मेरे साथ साथ
आज कुछ देर साथ आ के तो देखो

बड़ी बेदर्दी से पला है मुझ में
उस दिल की बात सुन के तो देखो

Saturday, January 15, 2011

वो अजीब शख्स था....

वो  अजीब  शख्स  था  भीड़  मैं  जो  नज़र  मैं  ऐसे  उतर   गया


जिसे  देख  कर  मेरे  होंट  पर  मेरा  अपना  शेर  ठहर  गया


कई  शेर  उस  की  निगाह  से  मेरे  रुख  पे  आ  के  ग़ज़ल  बने


वो  निराला  तर्ज़ -ए -पयाम था  जो  सुखन  की  हद  से  गुज़र  गया

वो  हर  एक  लफ्ज़  मैं  चाँद  था  वो  हर  एक  हर्फ़  मैं  नूर  था 


वो  चमकते  मिसरों   का  अक्स  था  जो  ग़ज़ल  में  खुद  ही  संवर  गया


जो  लिखूं  तो  नोक -ए -कलम   पे  वो  , जो  पढ़ूं  तो  नोक -ए -जुबां  पे  वो

मेरा  जौक  भी  मेरा  शौक   भी  मेरे  साथ  साथ  निखर  गया




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Thursday, January 6, 2011

फैसला तुमको भूल जाने का
एक नया ख्वाब है दीवाने का

दिल कली का लरज लरज उठा
जिक्र था फिर बहार आने का

हौसला कम किसी में होता है
जीत कर खुद ही हार जाने का

जिंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का

आप शहजाद की ना फिक्र करें
वो तो आदि है जख्म खाने का

- शहजाद

Saturday, January 1, 2011

सावन बीतो जाये पिहरवा ...
सावन बीतो जाये पिहरवा ...
मन मेरा घबराए..
ऐसो गए परदेस पिया तुम..
ऐसो गए परदेस पिया तुम.. चैन हमें नहीं आये..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मैं लाख जतन कर हारी
मैं लाख जतन कर हार रहीं

मोरा सैयां मोसे बोले ना..मोरा सैयां मोसे बोले ना..
तू जो नहीं तो ऐसे पिया हम..
तू जो नहीं तो ऐसे पिया हम...जैसे सुना आंगना
जैसे सुना आंगना.. नैन तिहारी राह निहारें..
नैन तिहारी राह निहारें.. नैन को तरसयों ना

मोरा सैयां मोसे बोले ना..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मैं लाख जतन कर हारी
मैं लाख जतन कर हार रहीं

मोरा सैयां मोसे बोले ना..मोरा सैयां मोसे बोले ना..

Monday, December 6, 2010

दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुःख सहते है
हम ने सुना था इस बस्ती में दिलवाले भी रहते है

एक हमे आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं
दुनिया वाले दिलवालों को और बहोत कुछ कहते है

बीत गया सावन का महिना मौसम ने नजरे बदले
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आंसू बहते है

जिन की खातिर शहर भी छोड़ा, जिन के लिए बदनाम हुए
आज वो भी हम से बेगाने बेगाने से रहते है

वो जो अभी इस राहगुजर से चाक ए गिरेबाँ गुजरा था
उस आवारा दीवाने को जालिब जालिब कहते है


-जालिब