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Tuesday, December 27, 2011

आपको..

आपको  भूल  जाए  हम  इतने  तो  बेवफ़ा  नहीं
आपसे  क्या  गिला  करे  आपसे  कुछ  गिला  नहीं

शीशा -ए -दिल  को  तोड़ना  उनका  तो  एक  खेल  है
हमसे  ही  भूल  हो  गयी  उनकी  कोई  ख़ता  नहीं

काश  वो  अपने  ग़म  मुझे  दे  दे  तो  कुछ  सुकूँ  मिले
वो  कितना  बदनसीब  है  ग़म  भी  जिसे  मिला  नहीं

जुर्म  है  गर -वफ़ा  तो  क्या  क्यों  मैं  वफ़ा  को  छोड़  दू
कहते  हैं  इस  गुनाह  की  होती  कोई  सज़ा  नहीं

Wednesday, June 22, 2011

आखिर कब तक..

झूटी सच्ची आस पे जीना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..
मय की जगह खून-ए-दिल पीना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे..
तूफानों की जद पे सफिना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

एक महीने के वादे पर साल गुजरा फिर भी ना आये..
वादे का ये एक महिना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

सामने दुनिया भर के गम है और इधर इक तनहा हम है..
सैकड़ों पत्थर इक आइना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..