फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
दिल जिगर तशना-ए-फ़रियाद आया
दम लिया था न क़यामत ने हनोज
फिर तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया
जिंदगी यूँ भी गुजर ही जाती
क्यों तेरा राहगुजर याद आया
कोई वीरानी सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया
हमने मजनू पे लड़कपन में असद
संग उठाया था के सर याद आया
- 'असद' ग़ालिब
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Sunday, April 18, 2010
Friday, December 18, 2009
दिल-ए-नादाँ
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में जुबान रखता हूँ
काश पूछो क़ि मुद्दआ क्या है
जब क़ि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा-ए-खुदा क्या है
ये परीचेहरा लोग कैसे हैं
गम्जा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है
शिकन-ए-जुल्फ अंबरी क्यों है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है
सब्जा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज है हवा क्या है
हमको उनसे वफ़ा क़ी है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश क़ी सदा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैंने माना के कुछ नही ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
-ग़ालिब
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में जुबान रखता हूँ
काश पूछो क़ि मुद्दआ क्या है
जब क़ि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा-ए-खुदा क्या है
ये परीचेहरा लोग कैसे हैं
गम्जा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है
शिकन-ए-जुल्फ अंबरी क्यों है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है
सब्जा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज है हवा क्या है
हमको उनसे वफ़ा क़ी है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश क़ी सदा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैंने माना के कुछ नही ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
-ग़ालिब
Thursday, December 17, 2009
इश्क में गैरते-ज़ज्बात ने रोने न दिया
वरना क्या बात थी जिस बात ने रोने न दिया
आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप के इस बात ने रोने न दिया
रोने वालों से कहो उनका भी रोना रो लें
जिनको मज़बूरी-ए-हालात ने रोने न दिया
तुझसे मिलकर हमें रोना था, बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया
एक दो रोज का रोना हो तो रो लें 'फ़ाकिर'
हमको हर रोज के सदमात ने रोने न दिया
- सुदर्शन फ़ाकिर
Sunday, December 6, 2009
रोना आया
ए मोहबत तेरे अंज़ाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया
यूँ तो हर शाम उमीदों पे गुजर जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
कभी तक़दीर का मातम, कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क में हर गाम पे रोना आया
मुझपे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी
इस कदर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया
जब हुआ जिक्र ज़माने में मोहबत का 'शकील'
मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया
-शकील
Wednesday, December 2, 2009
असद
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक
आशकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिलका क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक
हमने माना के तगाफुल ना करोगे लेकिन
खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक
फर्तब ए खुर से शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नजर होने तक
गम ए हस्ती का 'असद' किससे हो जुज्मर्ग इलाज
शम्मा हर रंग जलती है सहर होने तक
- असद ग़ालिब
http://www.youtube.com/watch?v=pOUktERIIZo
http://www.youtube.com/watch?v=wLhUuLmtl4A
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Sunday, November 15, 2009
गालिब
यह न थी हमारी किस्मत, के विसाल- ए- यार होता
अगर और जीते रहते, तो यही इंतज़ार होता
तेरे वादे पर जीये हम, तो यह जान झूट जाना
के ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता
तेरी नाज़ुकी से जाना, के बंधा था इहेद बड़ा
कभी तू न तोड़ सकता, अगर ऊस्तुवार होता
कोइ मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर- ए- नीमकश को
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता
ये कहाँ की दोस्ती है, के बने हैं दोस्त नासेह
कोइ चारासाज़ होता, कोइ ग़मगुसार होता
रग- ए- संग से टपकता, वो लहू कई फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो, ये अगर शरारह होता
ग़म अगरचेह जान गुलिस है, पर कहाँ बचाएँ के दिल है
ग़म- ए- इश्क गर न होता, ग़म- ए- रोज़गार होता
कहूँ किस से मैं के क्या है, शब् -ए -ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता
हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों न गर्क- ए- दरिया
न कभी जनाजा उठता, न कहीं मजार होता
उसे कौन देख सकता, के यगाना है वो यकता
जो दूई की बू भी होती, तो कहीं दो चार होता
ये मसाल- ए- तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'गालिब '
तुझे हम वली समझते, जो न बादा ख्वार होता
अगर और जीते रहते, तो यही इंतज़ार होता
तेरे वादे पर जीये हम, तो यह जान झूट जाना
के ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता
तेरी नाज़ुकी से जाना, के बंधा था इहेद बड़ा
कभी तू न तोड़ सकता, अगर ऊस्तुवार होता
कोइ मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर- ए- नीमकश को
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता
ये कहाँ की दोस्ती है, के बने हैं दोस्त नासेह
कोइ चारासाज़ होता, कोइ ग़मगुसार होता
रग- ए- संग से टपकता, वो लहू कई फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो, ये अगर शरारह होता
ग़म अगरचेह जान गुलिस है, पर कहाँ बचाएँ के दिल है
ग़म- ए- इश्क गर न होता, ग़म- ए- रोज़गार होता
कहूँ किस से मैं के क्या है, शब् -ए -ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता
हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों न गर्क- ए- दरिया
न कभी जनाजा उठता, न कहीं मजार होता
उसे कौन देख सकता, के यगाना है वो यकता
जो दूई की बू भी होती, तो कहीं दो चार होता
ये मसाल- ए- तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'गालिब '
तुझे हम वली समझते, जो न बादा ख्वार होता
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मेरे हमनफस मेरे हम नवाँ
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क से जान वलब, मुझे जिंदगी की दुआ न दे
मेरे दाग-ए-दिल से है रोशनी, उसी रोशनी से है जिंदगी
मुझे डर है अए चारागर, ये चराग तू ही बुझा न दे
कभी जाम लब पे लगा दिया कभी मुस्कुराके हटा दिया
तेरे छेड़-छाड़ में साथिया, मेरी तशनगी को बढ़ा न दे
मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये तेरी नवाजिश-ए-मुख्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे
मेरा अज़्म इतना बलंद है के पराये शोलों का डर नहीं
मुझे खौफ आतिशे गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे
वो उठे हैं लेके होम-ओ-सुब्बू, अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू
तेरा जाम लेने को बज्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
-'शकील'
Saturday, October 17, 2009
कुछ तो दुनिया की
कुछ तो दुनिया की
कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया
और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया
हम तो समजे थे के बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
दिल तो रोता रहे और ऑंख आंसू न बहे
इश्क की ऐसी रवायात ने दिल तो़ड़ दिया
वो मेरे हैं मुझे मिल जायेंगे आ जायेंगे
ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया
आप को प्यार है मुझसे के नहीं है मुझसे
जाने क्यूँ ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया
हम तो समजे थे के बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया...
- सुदर्शन फाकीर
Sung By - Begum Akhtar
Lyrics By - Sudarshan Faakir
Lyrics By - Sudarshan Faakir
मराठी रूपांतर
आणि कुठल्या परिस्थितीच्या कटूतांनी हृदय तोडून दिले
मी तर समजलो होतो की वर्षावात बरसेल मदिरा
आला वर्षा ऋतू तर वर्षावांनी हृदय तोडून दिले
हृदय तर रडत राहे आणि डोळे अश्रू न वाहवे
प्रेमाच्या अश्या सामांजस्यांनी हृदय तोडून दिलं
ते माझे आहे मला मिळून जातील येऊन जातील
अश्या निरथर्क विचारांनी हृदय तोडून दिले
आपल्याला प्रेम आहे माझ्याशी की नाही आहे माझ्याशी
काय माहित अश्या प्रश्नचिन्हांनी हृदय तोडून दिले
मी तर समजलो होतो की वर्षावात बरसेल मदिरा
आला वर्षा ऋतू तर वर्षावांनी हृदय तोडून दिले
कुठल्याश्या जगाच्या कृपांनी हृदय तोडून दिले ....
- सुदर्शन फाकीर
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