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Monday, July 16, 2012

क्या है..

अपनी   तस्वीर  को  आँखों  से  लगाता  क्या  है
इक  नज़र  मेरी  तरफ  देख  तेरा  जाता  क्या  है
 
 मेरी  रुसवाई  में  वो  भी  है  बराबर  के  शरीक़
मेरे  किस्से  मेरे  यारों  को  सुनाता  क्या  है
 
 पास  रह  कर  भी  ना  पहचान  सका  तू  मुझ  को 
दूर  से  देख  कर  अब  हाथ  हिलाता  क्या  है
 
 उम्र  भर  अपने  गिरेबाँ  से  उलझने  वाले 
तू  मुझे  मेरे  ही  साये  से  डराता  क्या  है
 
 मैं  तेरा  कुछ  भी  नहीं  हूँ  मगर  इतना  तो  बता 
देख  कर  मुझ  को  तेरे  ज़ेहन  में  आता  क्या  है
 


सफ़र- ए- शौक़  मैं  क्यूँ  काँपते  पाँव  तेरे 
दूर  से  देख  के  अब  हाथ  उठाता  क्या  है
 



मर  गए  प्यास  के  मारे  तो  उठा  अब्र- ए- करम 
बुझ  गयी  बज़्म  तो  अब  शम्मा  जलाता  क्या  है 
 
  शहजाद  अहमद 

Monday, November 28, 2011

अब और..

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाये हम
ये भी बहोत है तुझको अगर भूल जाये हम

इस जिंदगी में इतनी फ़रागत किसे नसीब
इतना ना याद आ के तुझे भूल जाये हम

तू इतनी दिलज़दा तो न थी ए शब्-ए-फिराक
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाये हम

वो लोग अब कहाँ है जो कहते थे कल फराज
ये ए खुदा ना कर तुझको भी रुलाये हम

- अहमद फ़राज़

Friday, October 14, 2011

यह आलम...

यह आलम शौक का देखा ना जाए
वोह बुत है या खुदा देखा ना जाए

यह किन नज़रों से तुमने आज देखा
के तेरा देखना देखा ना जाए

हमेशा के लिए मुझसे बिछड़ जा
यह मंज़र बारहां देखा न जाए 

गलत है जो सुना पर आजमा कर
तुझे ऐ बावफा देखा ना जाए

यह महरूमी नहीं पास-ऐ-वफ़ा है
कोई तेरे सिवा देखा ना जाए

फ़राज़ अपने सिवा है कौन तेरा
तुझे तुझसे जुदा देखा ना जाये

- अहमद फ़राज़

वो  कोई  और  न  था  चंद  खुश्क  पत्ते  थे
शज़र  से  टूट  के  जो  फ़स्ल-ए-गुल  पे  रोए  थे

अभी  अभी  तुम्हें  सोचा  तो  कुछ  न  याद  आया
अभी  अभी  तो  हम  एक -दुसरे  से  बिछड़े   थे

तुम्हारे  बाद  चमन  पर  जब  इक  नज़र  डाली
कलि  कलि  में  खिज़ां  के  चिराग  जलते  थे

तमाम  उम्र  वफ़ा  के  गुनाहगार  रहे
ये  और  बात  की  हम  आदमी  तो  अच्छे  थे

शब् -ए -खामोश  को  तनहाई  ने  ज़बान  दे  दी
पहाड़  गूंजते  थे  दश्त  सनसनाते  थे 

वो  एक  बार  मरे  जिन  को  था  हयात  से  प्यार
जो  ज़िन्दगी  से  गुरेज़ाँ  थे  रोज़  मरते  थे 

नए  ख्याल  अब  आते  हैं  ढल  के  ज़हन  मैं
हमारे  दिल  मैं  कभी  खेत  लहलहाते  थे 

ये  इरतिका  का  चलन  है  के  हर  ज़माने  में
पुराने  लोग  नए  आदमी  से  डरते  थे 

नदीम  जो  भी  मुलाक़ात  थी  अधूरी  थी
के  एक  चेहरे  के  पीछे  हज़ार  चेहरे  थे

Thursday, September 22, 2011

ले चला..

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से बेहतर था न आना तेरा

तू जो ऐ जुल्फ परेशान रहा करती है
किसके उजड़े हुए दिल में ठिकाना तेरा

आरजू ही न रहीं सुबह ऐ वतन की मुझको
शाम ऐ ग़ुरबत है अजब वक़्त सुहाना तेरा

अपनी आँखों में अभी कौंध गयी बिजली सी
हम न समझे के यह आना है के जाना तेरा

- दाग देहलवी

Thursday, September 8, 2011

राज़ की बातें

राज़ की बातें लिखी और ख़त खुला रहने दिया
जाने क्यूँ रुसवाईओं का सिलसिला रहने दिया

उम्र भर मेरे साथ रहकर वो ना समजा दिल की बात
दो दिलों के दरमियाँ इक फ़ासला रहने दिया

अपनी फ़ितरत बदल पाया न इसके बावजूद
खत्म की रंजिश मगर फिर भी गिला रहने दिया

मैं समज़ता था ख़ुशी देगी मुझे सबीर-ए-फरेब
इसलिए मैं ने ग़मों से राबिता रहने दिया


- सबीर जलालाबादी

Wednesday, August 10, 2011

कोई..

ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई
इसलिए रूठ रहे हैं कि मनाए कोई

ये न पूछो कि ग़मे-हिज्र में कैसी गुज़री
दिल दिखाने का हो तो दिखाए कोई

हो चुका ऐश का जलसा तो मुझे ख़त पहुँचा
आपकी तरह से मेहमान बुलाए कोई

तर्के-बेदाद की तुम दाद न पाओ मुझसे
करके एहसान न एहसान जताए कोई

क्यों वो मय-दाख़िल-ए-दावत ही नहीं ऐ वाइज़
मेहरबानी से बुलाकर जो पिलाए कोई

सर्द मेहरी से ज़माने के हुआ है दिल सर्द
रखकर इस चीज़ को क्या आग लगाए कोई

आप ने दाग़ को मुँह भी न लगाया अफ़सोस
उसको रखता था कलेजे से लगाए कोई


- दाग देहलवी

Tuesday, July 5, 2011

मोहसीन नक़वी

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचोमें गुम रहते हो

तेज हवा ने मुझसे पूछा
रेत पे क्या लिखते रहते हो


कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो

हमसे ना पूछो हिज्र के किस्से
अपनी कहो अब तुम कैसे हो

- मोहसीन नक़वी

Thursday, April 28, 2011

जिंदगी से...

जिंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहोत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं
एक मुसाफिर भी काफ़िला है मुझे

दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाइश थी आबला है मुझे

लब कुषा हूँ तो इस यकीन के साथ
क़त्ल होने का हौसला है मुझे

कौन जाने के चाहतो में 'फ़राज़'
क्या गवायाँ क्या मिला है मुझे

- अहमद फ़राज़

Tuesday, April 26, 2011

नजर मिला के मेरे पास आ के लूट लिया
नजर हटी थी के फिर मुस्कुरा के लूट लिया

दुहाई है मेरे अलाह की दुहाई है 
किसी ने मुझ से मुझी को छुपा के लूट लिया

सलाम उस पे के जिस ने उठा के पर्दा-ए-दिल
मुझी में रह के मुझी में समां के लूट लिया

यहाँ तो खुद तेरी हस्ती है इश्क को दरकार
वो और होंगे जिन्हें मुस्कुरा के लूट लिया

निगाह डाल दी जिस पर हसीं आँखों ने
उसे भी हुस्न-ए-मुजस्सम बना के लूट लिया
  

- जिगर मुरादाबादी

Thursday, April 21, 2011

फिर....

फिर  उसी  राह  गुज़र  कर  शायद
हम  कभी  मिल  सकें  मगर  शायद

जान  पहचान  से  क्या  होगा
फिर  भी  ऐ  दोस्त  गौर  कर  शायद

मुन्तजिर  जिनके  हम  रहे  उनको
मिल  गए  और  हम  सफ़र  शायद

जो  भी  बिछड़े  हैं  कब  मिले  हैं  'फ़राज़'
फिर  भी  तू  इंतज़ार  कर  शायद

- अहमद  फ़राज़

Sunday, February 20, 2011

अतहर नफीस

ना उड़ा यूँ ठोकरों से मेरी खाक-ए-कब्र जालिम
यही एक रह गयी है मेरे प्यार की निशानी

तुझे पहली ही कहा था हैं जहाँ सराह-ए-फ़ानी
दिल-ए-बदनसीब तुने मेरी बात ही न मानी

सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं


कभी कहाँ ना किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को

सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा दूँ गरीब खाने को

जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का हैं जिसमें अब ज़िंदा हूँ मैं

मेरे होंठो का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तुने मुझको बाग जाना देख ले सेहरा हूँ मैं

देखिए मेरी पजीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त की दहलीज़ पर आया हूँ मैं


इसका रोना नहीं क्यूँ तुम ने किया दिल बरबाद
इस का गम है के बहोत देर में बरबाद किया

मुझ को तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद
लोग कहते के तुम ने मुझे बरबाद किया 

- अतहर नफीस

Friday, March 5, 2010

तेरे आने का धोखा सा रहा है
दिया सा रात भर जलता रहा है

अजब है रात से आँखों का आलम
ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है

सुना है रात भर बरसा है बादल
मगर वो शहर जो प्यासा रहा है

वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
जो पिछली रात से याद आ रहा है

किसे ढून्दोगे इन गलियों में 'नासिर'
चलो अब घर चले दिन जा रहा है

- नासिर

Sunday, December 13, 2009

यूँ सजा चाँद



यूँ सजा चाँद के छलका तेरे अंदाज का रंग
यूँ फिज़ा महकी के बदला मेरे हमराज का रंग

साया-ए-चश्म में हैरां रुख-ए-रोशन का जमाल
सुर्खि-ए-लब में परीशां तेरी आवाज का रंग

बे पिए हूँ के अगर लुत्फ़ करो आखिर-ए-शब
शीशा-ओ-मय में ढलें सुबह के आगाज का रंग

चंग-ओ-नै, रंग पे थे अपने लहू के दम से
दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज का रंग

- फैज़ अहमद फैज़

नासिर

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी, अब याद आया

आज मुश्किल था संभलना ए दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

हाले-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख्सत हुए, तब याद आया

 
दिन गुजारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में 'नासिर'
हम बहुत रोये, वो जब याद आया

- नासिर

पत्ता पत्ता शबनम शबनम ....

पत्ता पत्ता शबनम शबनम मौसम भीगी आँखोका
गुलशन गुलशन एकही मौसम
मौसम भीगी आँखोका

आँखोसे कुछ तारे टूटे किस्मत चमकी दामन की
आज हुआ जायज और का मौसम
मौसम भीगी आँखोका

अब के बरस भी तनहाई के बादल अपने सर पर हैं
अब के बरस भी देखेंगे हम
मौसम भीगी आँखोका

भीगी आँखोके मौसम का इतना ही अफसाना हैं
फूलोंके खिलने का मौसम
मौसम भीगी आँखोका

और 'निजाम' अब घरसे निकले वीरान-ए-आबाद करें
वरना होगा हमसे बरहम
मौसम भीगी आँखोका 

- निजाम

Wednesday, December 2, 2009

असद

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिलका क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक

हमने माना के तगाफुल ना करोगे लेकिन
खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक


फर्तब ए खुर से शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नजर होने तक

गम ए हस्ती का 'सद' किससे हो जुज्मर्ग इलाज
शम्मा हर रंग जलती है सहर होने तक

- असद ग़ालिब



http://www.youtube.com/watch?v=ih6BTkJ1Ujc&feature=related
http://www.youtube.com/watch?v=pOUktERIIZo
http://www.youtube.com/watch?v=wLhUuLmtl4A

Saturday, October 3, 2009

तनहा.. तनहा.. मत सोचा कर.


तनहा.. तनहा.. मत सोचा कर.

तनहा तनहा मत सोचा कर..
मर जायेगा मर जायेगा.. मत सोचा कर..

प्यार घडी भर का ही बहोत है..
झुटा.. सच्चा.. मत सोचा कर...

जिसकी फ़ितरत ही डंसना हो..
वो तो डंसेगा मत सोचा कर..

धुप में तनहा कर जाता
क्यूँ यह साया मत सोचा कर..

अपना आप गवाँ कर तुने,
पाया है क्या मत सोचा कर

राह कठिन और धूपे कडी है
कोन आयेगा मत सोचा कर..

ख्वाब, हकीकत या अफसाना
क्या है दुनिया मत सोचा कर

मूँद ले आँखें और चले चल....
मंजिल रास्ता.. मत सोचा कर

दुनिया के गम साथ हैं.. तेरे
खुद को तनहा, मत सोचा कर

जी ना, दोबहर हो जायेगा
जानां. इतना मत सोचा कर

मान मेरे शहजाद वगरना
पछताएगा मत सोचा कर...


-फरहत शहजाद


Thursday, September 10, 2009

गए दिनों का सुराग लेकर
गए दिनों का सुराग लेकर, किधर से आया किधर गया वो..
गए दिनों का सुराग लेकर, किधर से आया किधर गया वो..
अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो..

गए दिनों का सुराग लेकर, किधर से आया किधर गया वो..

बस एक मोती सी छब दिखाकर ..
बस एक मोती सी छब दिखाकर..बस एक मीठी सी धुन सुनाकर
सितारा-ए-शाम बनके आया, बरअंगे ख्वाबे सहर गया वो..

अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो..
गए दिनों का सुराग लेकर..

न अब वो यादोंका चढ़ता दरया
न अब वो यादोंका चढ़ता दरया ..न फुर्सतोंकी उदास बरखा..
यूँही जरासी कसक है दिल में...यूँही जरासी कसक है दिल में
जो जख्म गहरा था भर गया वो..

अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो..
गए दिनों का सुराग लेकर..

वो हिज्र की रात का सितारा..
वो हिज्र की रात का सितारा, वो हमनफस हमसुखन हमारा
सदा रहे उसका नाम प्यारा..सदा..... रहे उसका नाम प्यारा .....
सुना है कल रात मर गया वो.......

अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो..
गए दिनों का सुराग लेकर..

वो रात का बेनवा मुसाफिर..
वो रात का बेनवा मुसाफिर..
वो तेरा शाइर वो तेरा नासिर
तेरी गली तक तो हमने देखा था फिर न जाने किधर गया वो....

अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो..
गए दिनों का सुराग लेकर.. किधर से आया किधर गया वो..
गए दिनों का सुराग लेकर..

नासिर

सुराग- चिन्हे
अजीब- विचित्र
मानूस- परिचित
बरअंगे ख्वाबे- स्वप्नील
सहर- प्रभात, पहाट, सकाळ
दरया- प्रवाह, नदी
बरखा- विरक्त, खिन्न, उदास
कसक- संभ्रम
हिज्र- विरह, वियोग
हमनफस- मित्र, सखा
हमसुखन- एकत्र बोलणारे, काव्य करणारे
बेनवा- कंगाल
शाइर- कवी
नासिर- सदोपदेशक, लीन, विनयशील



मराठी रुपांतर


गेल्या दिवसांच्या खुणा घेऊन, कुठून आला कुठे गेला तो..
विचित्र परिचित पण अनोळखी होता, मला तर हैराण करून गेला तो..

बस एक मौतिक (मोतीसारखी) छबी दाखवून..
बस एक मौतिक (मोतीसारखी) छबी दाखवून..बस एक गोड (सुरेल) धून ऐकवून
सायंतारा बनून आला, स्वप्नील पहाट बनून गेला तो....

ना आता तो आठवणींचा चढता दर्या
ना सवडीची उदास चर्या...
अशीच जराशी सल आहे हृदयात..अशीच जराशी सल आहे हृदयात
जो घाव खोल होता, भरून गेला तो..

तो वियोगाच्या रात्रीचा तारा...
तो वियोगाच्या रात्रीचा तारा, तो सखा काव्यमित्र आपला
सदा राहो त्याचं नाव प्रिय ... सदा ...राहो त्याचं नाव प्रिय
ऐकले आहे, काल रात्री मरून गेला तो...

तो रात्रीचा कंगाल मुसाफिर...
तो रात्रीचा कंगाल मुसाफिर...
तो तुझा कवी तो तुझा चाहता
तुझ्या गल्ली पर्यंत तर आपण पाहिले होते परत काय माहित कुठे गेला तो...

गेल्या दिवसांच्या खुणा घेऊन, कुठून आला कुठे गेला तो..
विचित्र परिचित पण अनोळखी होता, मला तर हैराण करून गेला तो....

नासिर