Tuesday, December 29, 2009

हिजाब को..

हिजाब  को..
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था.... 
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था
हाँ  मुझी  को...
मुझी  को...
हाँ  मुझी  को  ख़राब  होना  था
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था , हिजाब  को ...

खेली  बचपन  में  आँख  मचोली  बहोत  
खेली  बचपन  में  आँख  मचोली  बहोत....
खेली  बचपन  में  आँख  मचोली  बहोत
आया  शबाब...
आया  शबाब  तो  हिसाब  होना  था 
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था , हिजाब  को ...

साथ  रहते  हैं  रात  दिन  की  तरह
साथ  रहते  हैं  रात  दिन  की  तरह
साथ  रहते  हैं  रात  दिन  की  तरह.....
तुम  हो  माहताब...
तुम  हो  माहताब  मुझे  आफताब  होना  था 
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था , हिजाब  को ...

मेरी  आँखों  का  कुछ  क़ुसूर  नहीं
मेरी  आँखों  का  कुछ  क़ुसूर  नहीं
मेरी  आँखों  का  कुछ  क़ुसूर  नहीं
हुस्न  को...
हुस्न  को  लाज़वाब  होना  था 
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था , हिजाब  को ...

था  मुक़द्दर  में  हमारा  मिलना 
था..था  मुक़द्दर  में  हमारा  मिलना...
था  मुक़द्दर  में  हमारा  मिलना..
वगरना  हममें...
वगरना  हममें  कहाँ  कामयाब  होना  था
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था ,
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था , हिजाब  को ...

हिजाब  को  बेनकाब  होना  था
हाँ  मुझी  को  ख़राब  होना  था
हिजाब  को  बेनकाब  होना  था , हिजाब  को ...

Monday, December 28, 2009

बात करनी मुझे मुश्किल

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसे अब है तेरी महफ़िल, कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-करार
बेकरारी तुझे ऐ दिल, कभी ऐसी तो न थी

उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
के तबीअत मेरी माइल, कभी ऐसी
तो न थी

चश्मे-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई कातिल, कभी ऐसी
तो न थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फर' से हर बार
ख़ु तेरी हुरश्माइल, कभी ऐसी
तो न थी

- बहादुरशाह ज़फर




Sunday, December 27, 2009

कैसे छुपाऊं..

कैसे छुपाऊं राजे-गम, दीदा-ए-तर को क्या करूँ
दिल की तपिश को क्या करूँ, सोजे-जिगर को क्या करूँ

शोरिशे-आशिक़ी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूँ

ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूँ बसर
सब ये क़ुबूल है मगर, खौफे-सहर को क्या करूँ

हाल मेरा था जब बतर, तब न हुई तुम्हें खबर
बाद मेरे हुआ असर, अब मैं असर को क्या करूँ

- हसरत मोहानी



Monday, December 21, 2009

खामोश हो क्यों


खामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
बिस्मिल हो तो कातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते

वहशत का सबब रौजने-ज़िंदा तो नहीं है
मेहरो-महो-अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते

एक यह भी तो अंदाजे-इलाजे-गमे-जाँ है
ये चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते

रहजन हो हाजिर है मताए-दिलो-जाँ भी
रहबर हो तो मंजिल का पता क्यूँ नहीं देते

मुंसिफ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

साये हैं अगर हम तो हो क्यों हमसे गुरेजाँ
दीवार अगर हैं तो गिरा क्यूँ नहीं देते

क्या बीत गयी अबके 'फ़राज़' अहले चमन पर
याद आने का कफस मुझको सदा क्यूँ नहीं देते

- अहमद फ़राज़

Sunday, December 20, 2009

फैज़

हमके ठहरे अजनबी कितनी मुलाकातों के बाद

फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद

कब नज़र में आएगी बेदाग़ सब्जे की बहार

खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

थे बहोत बेदर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क के

थी बहोत बे-मेहर सुबहें मेहरबान रातों के बाद

उनसे जो कहने गए थे 'फैज़' जा सदका किये

अनकही ही रह गयी वोह बात सब बातों के बाद
 
- फैज़ अहमद फैज़

यह कौन आता है तनहाईओ में..

यह कौन आता है तनहाईओ में जाम लिए
दिलोंमे चांदनी रातोंका एहतमाम लिए

चटक रही है किसी याद की कली दिलमें
नजर में रख्श-बहारांओ की सुबह-ओ-शाम लिए

महक महक के जगाती रही नसीमे सहर
लबोंपे यार मसीहा नफ़ज़ का नाम लिए
 
किसी ख्याल की खुशबू किसी बदन की महक
दरे कफस के खड़ी है सबा पयाम लिए

बजा रहा था कहीं दूर कोई शहनाई
उठा हूँ आंखोंमे एक ख्वाब नातमाम लिए

- मखदूम मोहिउद्दीन


Friday, December 18, 2009

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

शर-ओ-आइन पर मदार सही
ऐसे क़ातिल का क्या करे कोई

चाल जैसे कड़ी कमाँ का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई

बात पर वाँ जबाँ कटती है
वो कहें और सुना करे कोई

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई

रोक लो गर गलत चले कोई
बख्श दो गर ख़ता करे कोई

कौन है जो नही है हाजतमंद
किसकी हाजतरवा करे कोई

क्या किया ख़िज्र ने सिकंदर से
अब किसे रहनुमा करे कोई

जब तवक्को ही उठ गई 'ग़ालिब'
क्यों किसी का गिला करे कोई

-ग़ालिब

मराठी अनुरूप

पुत्र मेरीचा होऊन करे कोणी 
माझ्या दुःखाचा उपाय करे कोणी

वाईटांचा कायदा वर अवलंब खरा
अश्या खुनीचे काय करे कोणी

चाल जशी ताणलेल्या धनुष्याचा बाण
हृदयात असा कि जाई करे कोणी

बोलल्यावर जीभ कापत आहे
ते सांगे आणि ऐकण करे कोणी

रटत राहत आहे वेड्यात काय काय
काही न समजो देवा! करे कोणी

न ऐको जर वाईट बोले कोणी
न बोलो जर वाईट करे कोणी

रोधून घ्या जर चुकीच चाले कोणी
क्षमा द्या जर अपराध करे कोणी

कोण आहे जो नाही आहे इच्छुक
कोणाची इच्छापूर्ती करे कोणी

काय केले खिज्रने सिकांदारास
आता कशास पथदर्शक करे कोणी

जेव्हा आशा ही उडून गेली 'गालिब'
का कोणाचा शोक करे कोणी

-गालिब


दिल-ए-नादाँ

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है

मैं भी मुँह में जुबान रखता हूँ
काश पूछो क़ि मुद्दआ क्या है

जब क़ि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा-ए-खुदा क्या है

ये परीचेहरा लोग कैसे हैं
गम्जा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है

शिकन-ए-जुल्फ अंबरी क्यों है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है

सब्जा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज है हवा क्या है

हमको उनसे वफ़ा क़ी है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश क़ी सदा क्या है

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है

मैंने माना के कुछ नही ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

-ग़ालिब

Thursday, December 17, 2009


इश्क में गैरते-ज़ज्बात ने रोने न दिया
वरना क्या बात थी जिस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप के इस बात ने रोने न दिया

रोने वालों से कहो उनका भी रोना रो लें
जिनको मज़बूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था, बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज का रोना हो तो रो लें 'फ़ाकिर'
हमको हर रोज के सदमात ने रोने न दिया

- सुदर्शन फ़ाकिर

Sunday, December 13, 2009

यूँ सजा चाँद



यूँ सजा चाँद के छलका तेरे अंदाज का रंग
यूँ फिज़ा महकी के बदला मेरे हमराज का रंग

साया-ए-चश्म में हैरां रुख-ए-रोशन का जमाल
सुर्खि-ए-लब में परीशां तेरी आवाज का रंग

बे पिए हूँ के अगर लुत्फ़ करो आखिर-ए-शब
शीशा-ओ-मय में ढलें सुबह के आगाज का रंग

चंग-ओ-नै, रंग पे थे अपने लहू के दम से
दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज का रंग

- फैज़ अहमद फैज़

नासिर

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी, अब याद आया

आज मुश्किल था संभलना ए दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

हाले-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख्सत हुए, तब याद आया

 
दिन गुजारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में 'नासिर'
हम बहुत रोये, वो जब याद आया

- नासिर

पत्ता पत्ता शबनम शबनम ....

पत्ता पत्ता शबनम शबनम मौसम भीगी आँखोका
गुलशन गुलशन एकही मौसम
मौसम भीगी आँखोका

आँखोसे कुछ तारे टूटे किस्मत चमकी दामन की
आज हुआ जायज और का मौसम
मौसम भीगी आँखोका

अब के बरस भी तनहाई के बादल अपने सर पर हैं
अब के बरस भी देखेंगे हम
मौसम भीगी आँखोका

भीगी आँखोके मौसम का इतना ही अफसाना हैं
फूलोंके खिलने का मौसम
मौसम भीगी आँखोका

और 'निजाम' अब घरसे निकले वीरान-ए-आबाद करें
वरना होगा हमसे बरहम
मौसम भीगी आँखोका 

- निजाम

Sunday, December 6, 2009

रोना आया


ए मोहबत तेरे अंज़ाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया


यूँ तो हर शाम उमीदों पे गुजर जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया


कभी तक़दीर का मातम, कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क में हर गाम पे रोना आया


मुझपे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी
इस कदर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया


जब हुआ जिक्र ज़माने में मोहबत का 'शकील'
मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया


-शकील

आतिश

यह आरजू थी तुझे गुलके रूबरू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ्तगू करते

पयाम-बर ना मयस्सर हुआ तो खूब हुआ
जबान ए गैर से क्या शरह ए आरजू करते

मेरी तरह से माह ओ मेहर भी है आवारा
किसी हबीब की यह भी है जुस्तजू करते

जो देखते तेरी जंजीर ए जुल्फ का आलम
असीर होने की आजाद आरजू करते

वो जान ए जाँ नहीं आता तो मौत ही आती
दिल ओ जिगर को कहाँ तक लहू करते

ना पूछ आलम ए बरगश्ता तालिए 'आतिश'
बरसती आग जो बाराँ की आरजू करते  

- हैदर अली आतिश







मराठी रुपांतर



ही इच्छा होती तुला फुलांशी परिचित करावी
मी आणि व्याकुळ पक्ष्याशी बातचीत करावी


संदेशदूत नाही उपलब्ध झाला तर चांगले झाले
परक्या बोलीतून टीकेची इच्छा अपेक्षित करावी


माझ्याप्रमाणे चंद्र-सूर्य पण आहे मनसोक्त
कुणी मित्राचा असा अजून आहे संशोधित करावी


जो बघतो तुझ्या केसांच्या बंधनांची अवस्था
कैद होण्याची मुक्तता अपेक्षित करावी 


ते जीव जिवलग नाही आले तर मरण ही आले
हृदय काळीजाला कुठवर रक्तरंजित करावी


नको विचारू प्रतिकूल परिस्थिती धगधगत्या 'आतिश'
बरसते आग जी पावसाची अपेक्षित करावी


- हैदर अली आतिश

Saturday, December 5, 2009

होरी होये रही है


होरी होये रही है
अहमद जीयो के द्वार 
हज़रत अली का रंग बना है
हसन हुसैन खिलार
ऐय्सो होरी की धूम मची है 
चहुँ और पड़ी है पुकार
ऐय्सो अनोखो चतुर
खिलाडी
रंग दिनयों संसार
निअज़ प्यारा भर भर  छिडके
एक ही रंग सस पिचकार

जी चाहे  तो  शीशा  बन  जा , जी  चाहे  पैमाना  बन  जा
शीशा  पैमाना  क्या  बनना , मय  बन  जा  मयखाना  बन  जा ..

मय  बन  कर , मयखाना  बन  कर  मस्ती  का  अफसाना  बन  जा
मस्ती  का  अफसाना  बनकर  हस्ती  से  बेगाना  बन  जा

हस्ती  से बेगाना  होना  मस्ती  का  अफसाना  बनना
इस  होने  से  इस  बनने  से  अच्छा  है  दीवाना  बन  जा

दीवाना बन  जाने  से  दीवाना  होना  अच्छा  है
दीवाना  होने  से  अच्छा  खाक -ऐ -दर -ऐ -जानाना  बन  जा

खाक -ऐ  -दर -ऐ  -जानाना  क्या  है  अहले  दिल  की  आँखों   का  सुरमा
शमा  के  दिल  की  ठंडक  बन  जा  नूर -ऐ -दिल -ऐ -परवाना  बन  जा

सीख  ज़हीन  के  दिल  से  जलना  काहे  को  हर  शम्मा  पर  जलना
अपनी  आग  में   खुद  जल  जाये  तू  ऐसा  परवाना  बन  जा

- हज़रत  शाह  नियाज़  
http://www.radioreloaded.com/tracks/?22554
मनम अन नियाझ मंदी के बे तू नियाझ दारम
ग़मे चूं तो नाझनीनी बेह्झार नाझ दारम
तुई ही आफताब ऐ चश्मम बा जमाल तुस्त रोशन
अगर अझ तो बाझगीरम बाके चश्मे बाझ दारम
- रूमी
( हात पसरून तुझ्याकडे एक देणं मागतो आहे मी, तू दे एक वेदना, ती आहे मला हज़ार लेण्यांसारखी... तूच आहेस सूर्य माझा, माझी नजर प्रकाशलेली तेजाने तुझ्या.....जर मी नजर दूर फिरवली तुझ्यापासून, तर कोणाला परत पाहू मी?)
यार को हमने जा-ब-जा देखा
कही जाहिर कही छुपा देखा
कही मुमकिन हुआ कही वाजिब
कही फानी कही वफ़ा देखा
कही वो बादशाह-ए-तख़्तनशीन
कही कासा लिए गदा देखा
कही वो दर-लिबास-ए-माशुका
बर सरे नाझ और अदा देखा
कही आशिक नियाझ की सूरत
सीना बरियान-ओ-दिलजला देखा
- हजरत शाह नियाज़

Wednesday, December 2, 2009

साकियाँ जाए कहाँ हम तेरे मयखाने से
शहर के शहर नजर आते है वीराने से...
ये जो कुछ लोग नजर आते है दीवाने से
इनको मतलब है न साकी से न पैमाने से...
जोड़ कर हाथ ये साकी है गुजारिश मेरी
मुझको आखों से पिला, गैर को पैमाने से...
मुझको आते हुए तो नासिर सबने देखा,
देखा जाते हुए न किसीने मुझे मयखाने से....
( शायर- हकीम नासिर)

सूना है लोग


सूना  है  लोग  उसे  आँख  भर  के  देखते  हैं 
सो  उस  के  शहर  में  कुछ  दिन  ठहर  के  देखते  हैं 

सूना  है  बोल  तो  बातों  से  फूल  झरते  हैं 
ये  बात  है  तो  चलो  बात  कर  के  देखते  हैं 

सूना  है  रात  उसे  चाँद  तकता  रहता  है 
सितारे  बाम -ए -फलक  से  उतर  के  देखते  हैं 

सूना  है  दिन  को  उसे  तितलियाँ  सताती  हैं 
सूना  है  रात  को  जुगनू  ठहर  के  देखते  हैं 

सूना  है  रब्त  है  उसको  खराब  हालों  से 
सो  अपने  आप  को  बर्बाद  करके  देखते  हैं 

सूना  है  दर्द  की  ग़ाहक  है  चश्म -ए -नाज़  उसकी 
सो  हम  भी  उसकी  गली  से  गुज़र  कर  देखते  हैं 

अब  उसके  शहर  में  ठहरें  के  कुछ  कर  जाएँ
"फ़राज़" आओ  सितारे  सफ़र  के  देखते  हैं

-अहमद फ़राज़

असद

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिलका क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक

हमने माना के तगाफुल ना करोगे लेकिन
खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक


फर्तब ए खुर से शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नजर होने तक

गम ए हस्ती का 'सद' किससे हो जुज्मर्ग इलाज
शम्मा हर रंग जलती है सहर होने तक

- असद ग़ालिब



http://www.youtube.com/watch?v=ih6BTkJ1Ujc&feature=related
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http://www.youtube.com/watch?v=wLhUuLmtl4A