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Tuesday, December 27, 2011

आपको..

आपको  भूल  जाए  हम  इतने  तो  बेवफ़ा  नहीं
आपसे  क्या  गिला  करे  आपसे  कुछ  गिला  नहीं

शीशा -ए -दिल  को  तोड़ना  उनका  तो  एक  खेल  है
हमसे  ही  भूल  हो  गयी  उनकी  कोई  ख़ता  नहीं

काश  वो  अपने  ग़म  मुझे  दे  दे  तो  कुछ  सुकूँ  मिले
वो  कितना  बदनसीब  है  ग़म  भी  जिसे  मिला  नहीं

जुर्म  है  गर -वफ़ा  तो  क्या  क्यों  मैं  वफ़ा  को  छोड़  दू
कहते  हैं  इस  गुनाह  की  होती  कोई  सज़ा  नहीं

Monday, November 28, 2011

आँखों में जल रहा है..

आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ

चूल्हें नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ

आँखों के पोछने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं 
मेहमान ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

- गुलज़ार
 

जगजीत सिंग

जिंदगी यूँ हुई बसर तनहा
काफिला साथ और सफ़र तनहा

अपने साये से चौंक जाते है
उम्र गुजरी है इस कदर तनहा

रात भर बोलते है सन्नाटे
रात कांटे कोई किधर तनहा

दिन गुजरता नहीं है लोगो में
रात होती नहीं बसर तनहा

हम ने दरवाज़े तक तो देखा था 
फिर न जाने गए किधर तनहा

- गुलज़ार

Wednesday, June 22, 2011

आखिर कब तक..

झूटी सच्ची आस पे जीना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..
मय की जगह खून-ए-दिल पीना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

सोचा है अब पार उतरेंगे या टकरा कर डूब मरेंगे..
तूफानों की जद पे सफिना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

एक महीने के वादे पर साल गुजरा फिर भी ना आये..
वादे का ये एक महिना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

सामने दुनिया भर के गम है और इधर इक तनहा हम है..
सैकड़ों पत्थर इक आइना कब तक आखिर..
आखिर कब तक..

Thursday, April 21, 2011

फिर....

फिर  उसी  राह  गुज़र  कर  शायद
हम  कभी  मिल  सकें  मगर  शायद

जान  पहचान  से  क्या  होगा
फिर  भी  ऐ  दोस्त  गौर  कर  शायद

मुन्तजिर  जिनके  हम  रहे  उनको
मिल  गए  और  हम  सफ़र  शायद

जो  भी  बिछड़े  हैं  कब  मिले  हैं  'फ़राज़'
फिर  भी  तू  इंतज़ार  कर  शायद

- अहमद  फ़राज़

Wednesday, April 6, 2011

तू क्या है

हर एक बात पे कहते हो तुम के 'तू क्या है'
तुम ही कहो के यह अंदाजे-गुफ्तगू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख़ जुस्तजू क्या है

न शोलें में यह करिश्मा न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वोह शोखे -तुन्द खू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

रही न ताक़ते-गुफ्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

वोह चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बाड़े -गुल फामे-मुश्कबू  क्या  है

यह रश्क है के वो होता है हम सुखन तुमसे
वगरना खौफे-बाद आमोज़ी-ए-अदू क्या है

हुआ है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है

-ग़ालिब

Sunday, March 20, 2011

नमी सी है..

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है

दफ्न कर दो हमें के साँस मिले
नब्ज कुछ देर से थमी सी है

वक़्त रहता नहीं कही टिककर
इसकी आदत भी आदमी सी है

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्वीर लाजमी सी है

Saturday, September 18, 2010

किसको कातिल मैं कहूँ किसको मसीहा समझूँ..
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है किसे क्या समझूँ...


वो भी क्या दिन थे के हर वहम यकीन होता था...
अब हकीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ..


दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे..
ऐसे माहौल में अब किस को पराया समझूँ..


जुल्म यह है के है यकता तेरी बेगानारवी
लुफ़्त यह है के मैं अब तक तुझे अपना समझूँ...
 
 
 
 Video _ http://www.youtube.com/watch?v=TSJlQWhC-dc&feature=player_embedded#!

Sunday, August 29, 2010

गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी..

गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी..
                                     गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...
             यह नजराना तेरा भी है और मेरा भी...

अपने गमको गीत बनाकर गा लेना..
अपने गमको गीत बनाकर गा लेना..
राग पुराना तेरा भी है... मेरा भी..
राग पुराना तेरा भी है.. मेरा भी..
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...

                                   तू मुझको और मैं तुझको समझाऊ क्या..
तू मुझको और मैं तुझको समझाऊ क्या..
                                  दिल दीवाना तेरा भी है.. मेरा भी.. 
दिल दीवाना तेरा भी है.. मेरा भी..
              गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...

शहर में गलियों-गलियों जिसका चर्चा है..
शहर में गलियों-गलियों जिसका चर्चा है..
वो अफसाना तेरा भी है.. मेरा भी..

                                  मयखाना की बात ना कर वाइज मुझसे..
                                  आना-जाना तेरा भी.. मेरा भी..
                                  गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...

यह नजराना तेरा भी है और मेरा भी... 
            गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...

Sunday, March 7, 2010



कोई दोस्त है ना रकीब है
तेरा शहर कितना अजीब है

वो जो इश्क था वो जूनून था
ये जो हिज्र है ये नसीब है

यहाँ किसका चेहरा पढ़ा करूँ
यहाँ कौन इतना करीब है


मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल
यहाँ सबके सर पे सलीब है

तुझे देखकर मैं हूँ सोचता
तू हबीब है या रकीब है

- राना साहरी  

Sunday, December 20, 2009

यह कौन आता है तनहाईओ में..

यह कौन आता है तनहाईओ में जाम लिए
दिलोंमे चांदनी रातोंका एहतमाम लिए

चटक रही है किसी याद की कली दिलमें
नजर में रख्श-बहारांओ की सुबह-ओ-शाम लिए

महक महक के जगाती रही नसीमे सहर
लबोंपे यार मसीहा नफ़ज़ का नाम लिए
 
किसी ख्याल की खुशबू किसी बदन की महक
दरे कफस के खड़ी है सबा पयाम लिए

बजा रहा था कहीं दूर कोई शहनाई
उठा हूँ आंखोंमे एक ख्वाब नातमाम लिए

- मखदूम मोहिउद्दीन


Thursday, December 17, 2009


इश्क में गैरते-ज़ज्बात ने रोने न दिया
वरना क्या बात थी जिस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप के इस बात ने रोने न दिया

रोने वालों से कहो उनका भी रोना रो लें
जिनको मज़बूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था, बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज का रोना हो तो रो लें 'फ़ाकिर'
हमको हर रोज के सदमात ने रोने न दिया

- सुदर्शन फ़ाकिर

Wednesday, December 2, 2009

असद

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिलका क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक

हमने माना के तगाफुल ना करोगे लेकिन
खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक


फर्तब ए खुर से शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नजर होने तक

गम ए हस्ती का 'असद' किससे हो जुज्मर्ग इलाज
शम्मा हर रंग जलती है सहर होने तक

- असद ग़ालिब



http://www.youtube.com/watch?v=ih6BTkJ1Ujc&feature=related
http://www.youtube.com/watch?v=pOUktERIIZo
http://www.youtube.com/watch?v=wLhUuLmtl4A

Sunday, November 15, 2009

गालिब

यह न थी हमारी किस्मत, के विसाल- ए- यार होता
अगर और जीते रहते, तो यही इंतज़ार होता

तेरे वादे पर जीये हम, तो यह जान झूट जाना
के ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना, के बंधा था इहेद बड़ा
कभी तू न तोड़ सकता, अगर ऊस्तुवार होता

कोइ मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर- ए- नीमकश को
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता

ये कहाँ की दोस्ती है, के बने हैं दोस्त नासेह
कोइ चारासाज़ होता, कोइ ग़मगुसार होता

रग- ए- संग से टपकता, वो लहू कई फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो, ये अगर शरारह होता

ग़म अगरचेह जान गुलिस है, पर कहाँ बचाएँ के दिल है
ग़म- ए- इश्क गर न होता, ग़म- ए- रोज़गार होता

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब् -ए -ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों न गर्क- ए- दरिया
न कभी जनाजा उठता, न कहीं मजार होता

उसे कौन देख सकता, के यगाना है वो यकता
जो दूई की बू भी होती, तो कहीं दो चार होता

ये मसाल- ए- तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'गालिब '
तुझे हम वली समझते, जो न बादा ख्वार होता

Wednesday, November 4, 2009

साहिर होशियारपुरी

कौन  कहता  है  मोहब्बत  की  ज़ुबाँ  होती  है ..
यह  हकीकत  तो  निगाहों  से  बयाँ  होती  है

वो  न  आये  तो  सताती  है  खलिश  सी  दिल  को ..
वो  जो  आये  तो  खलिश  और  जवाँ होती  है

रूह  को  शाद  करे  दिल  को  जो  पुरनूर  करे ..
हर  नज़ारे  में  ये  तनवीर  कहा  होती  है

जब्त -ए -सहरापे  मोहब्बत  को  कहा  तक  रोके ..
दिल  में  जो  बात  हो  आँखों  से  अयाँ  होती  है

ज़िन्दगी  एक  सुलगती  सी  चिता  है  साहिर ..
शोला  बनती  है  ना  ये  बुझके  धुवाँ  होती  है

कौन  कहता  है  मोहब्बत  की  ज़ुबाँ  होती  है ..
यह  हकीकत  तो  निगाहों  से  बयाँ  होती  है

- साहिर होशियारपुरी



मराठी रुपांतर


कोण बोलत आहे की प्रेमाचं बोलण शक्य होत आहे 
ही सत्यता तर नजरेच्या प्रत्यंतरात शक्य होत आहे

ते नाही आले तर छळत असते सल हृदयाला
ते जर आले तर सलाला अजून चिरतारुण्य शक्य होत आहे

आत्माला प्रसन्नित करेन हृदयाला जो तेजोमय करेन 
प्रत्येक दृश्यात अशी प्रकाशमानता कुठे शक्य होत आहे

शुष्क-सहनशीलतेत प्रेमाला कुठवर थोपवावे
हृदयामध्ये जी गोष्ट असते डोळ्यांतून शक्य होत आहे

जीवन एक धुमसणारी चिता आहे 'साहीर'
आग बनत आहे न हे विझून धूर शक्य होत आहे

-साहिर होशियारपुरी

Thursday, October 29, 2009

आहिस्ता -आहिस्ता

सरकती जाए हैं रुख से नकाब आहिस्ता -आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफताब आहिस्ता -आहिस्ता

जवान होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा
हया यकलख्त आई और शबाब आहिस्ता -आहिस्ता

सब -ऐ -फ़ुर्कत का जागा हूँ परिस्तों अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता -आहिस्ता

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फर्क है इतना
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता -आहिस्ता

सवाल-ऐ-वस्ल पर उनके उदू का खौफ है इतना
दबे होंठो से देते हैं जवाब आहिस्ता -आहिस्ता

वो बड़ी बेदर्दी से सर काटे 'अमीर' और मैं कहूं उनसे
हुजुर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता -आहिस्ता



-अमीर




मराठी रूपांतर

सरकत जात आहे चेहराहून मृगसाज सावकाश सावकाश
निघत येत राहत आहे गगनराज सावकाश सावकाश
 




तरुण होऊ लागले जेव्हा ते तर आमच्याशी करून घेतला पडदा
लाज अचानक आली आणि तारुण्य सावकाश सावकाश
 



विरहाच्या युगांपासून जागा आहे दूतांनो आता तरी निजू दया
कधी सवलती मध्ये करून घ्या हिशेब सावकाश सावकाश



माझ्या आणि तुझ्या प्रेमामध्ये बस फरक आहे इतकाच
इकडे तर घाई घाई आहे तिकडे सावकाश सावकाश
 



मिलनाच्या प्रश्नावर त्यांच्या प्रतिस्पर्ध्याचे सावट आहे इतकं
दबकत ओठांनी देत आहेत उत्तर सावकाश सावकाश



ते मोठ्या निर्दयतेने शिर सरसावून 'अमीर' आणि मी बोलू त्यांच्यांशी
यजमान सावकाश सावकाश श्रीमान सावकाश सावकाश
 



-अमीर

Wednesday, September 23, 2009

हमसफ़र बनके हम साथ है, आज भी...

हमसफ़र बनके हम साथ है, आज भी...फिर भी है ये सफ़र, अजनबी..अजनबी..
राह भी अजनबी, मोड़ भी अजनबी,
जायेंगे हम किधर अजनबी.. अजनबी..

जिंदगी हो गयी है, सुलगता सफ़र ..
जिंदगी हो गयी है सुलगता सफ़र..
दूर तक आ रहा है, धुआ सा नजर..
जाने किस मोड़ पर, खो गयी हर ख़ुशी..
देके दर्द-ऐ-जिगर..अजनबी.. अजनबी..

हमसफ़र बनके हम साथ है, आज भी...फिर भी है ये सफ़र, अजनबी..अजनबी..

हमने चुन-चुनके तिनके, बनाया था जो..
हमने चुन-चुनके तिनके बनाया था जो..
आशियाँ हसरतों से सजाया था जो..
है चमन में वही, आशियाँ आज भी..
लग रहा है मगर, अजनबी.. अजनबी..

हमसफ़र बनके हम साथ है, आज भी...फिर भी है ये सफ़र, अजनबी..अजनबी..

किसको मालूम था, दिन ये भी आयेंगे..
किसको मालूम था दिन ये भी आयेंगे..
मौसमों की तरह दिल बदल जायेंगे..
दिन हुआ अजनबी ..रात भी अजनबी..
हर घडी हर पहर, अजनबी..अजनबी..

हमसफ़र बनके हम साथ है, आज भी...फिर भी है ये सफ़र, अजनबी..अजनबी..

राह भी अजनबी, मोड़ भी अजनबी, जायेंगे हम किधर अजनबी.. अजनबी..

- Madan Pal

Sung By - Jagjit Singh
Music By - Chitra Singh