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Friday, April 20, 2012

टूटे हुए..

टूटे हुए ख़्वाबों के लिए आँख ये तर्र क्यूँ
सोचो तो सही शाम है अंजामे सहर क्यूँ

जो ताज सजाए हुए फिरता हूँ अनाकर 
हालात के कदमों पे झुकेगा वहीँ सर क्यूँ

सिलते ही तो सिल जाए किसी ए फ़िक्र लबोंकी  
खुश रंग अंधेरों को कहूँगा मैं सहर क्यूँ
   
सोचा किया मैं हिज्र की दहलीज पे बैठा
सदियों में उतर जाता हैं लम्हों का सफ़र क्यूँ

हरजाई ए शहजाद ये तसलीन पछाना
सोचा भी कभी तुमने हुआ ऐसा मगर क्यूँ

Tuesday, January 3, 2012

वोह तो न मिल सकें..

वोह तो न मिल सकें हमें रुसवाइयाँ मिली
लेकिन हमारे इश्क को रानाइयां मिली


आँखों में उनकी डूब के देखा है बारहां
जिनकी थी आरजू न वो गहराइयाँ मिली


आइना रख के सामने आवाज दी उसे
उसके बगर जब मुझे तन्हाईयाँ मिली


आए थे वो नजर मुझे फूलों के आसपास
देखा करीब जाके तो परछाइयाँ मिली


पूछा जो दिल की मैंने तबाही का माजरा
हसकर जवाब दे मुझे अंगड़ाइयां मिली


नासिर दिल-ऐ-तबाह न उनको दिखा सदा
मिलने को बारहां उसे तन्हाईयाँ मिली


                            - नासिर

Tuesday, December 27, 2011

आपको..

आपको  भूल  जाए  हम  इतने  तो  बेवफ़ा  नहीं
आपसे  क्या  गिला  करे  आपसे  कुछ  गिला  नहीं

शीशा -ए -दिल  को  तोड़ना  उनका  तो  एक  खेल  है
हमसे  ही  भूल  हो  गयी  उनकी  कोई  ख़ता  नहीं

काश  वो  अपने  ग़म  मुझे  दे  दे  तो  कुछ  सुकूँ  मिले
वो  कितना  बदनसीब  है  ग़म  भी  जिसे  मिला  नहीं

जुर्म  है  गर -वफ़ा  तो  क्या  क्यों  मैं  वफ़ा  को  छोड़  दू
कहते  हैं  इस  गुनाह  की  होती  कोई  सज़ा  नहीं

Thursday, September 22, 2011

ले चला..

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से बेहतर था न आना तेरा

तू जो ऐ जुल्फ परेशान रहा करती है
किसके उजड़े हुए दिल में ठिकाना तेरा

आरजू ही न रहीं सुबह ऐ वतन की मुझको
शाम ऐ ग़ुरबत है अजब वक़्त सुहाना तेरा

अपनी आँखों में अभी कौंध गयी बिजली सी
हम न समझे के यह आना है के जाना तेरा

- दाग देहलवी

Monday, August 8, 2011

चला गया ...

दयार-ए-दिल की रात में चराग सा जला गया 
मिला नहीं तो किया हुआ वो शक्ल तो दिखा गया

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिया
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

यह सुबहओं की सफेदिया यह दोपहर की जर्दिया
अब आईने में देखता हूँ में कहाँ चला गया  

वो दोस्ती तो खैर अब नसीब-ए-दुश्मन हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया 

यह किस खुशी की रीत पर ग़मों को नींद आ गई
वोह लहर किस तरफ गई यह में कहाँ समां गया

Wednesday, July 27, 2011

गुलों में रंग भरे, बादे-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहरे-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंजे-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सरे-काकुल से मुश्के-बार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शबे-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले

हुज़ूरे-ए-यार हुई दफ़्तरे-जुनूँ की तलब
गिरह में लेके गरेबाँ का तार तार चले

मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले 



- फैज़

Thursday, January 6, 2011

फैसला तुमको भूल जाने का
एक नया ख्वाब है दीवाने का

दिल कली का लरज लरज उठा
जिक्र था फिर बहार आने का

हौसला कम किसी में होता है
जीत कर खुद ही हार जाने का

जिंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का

आप शहजाद की ना फिक्र करें
वो तो आदि है जख्म खाने का

- शहजाद

Monday, December 6, 2010

दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुःख सहते है
हम ने सुना था इस बस्ती में दिलवाले भी रहते है

एक हमे आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं
दुनिया वाले दिलवालों को और बहोत कुछ कहते है

बीत गया सावन का महिना मौसम ने नजरे बदले
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आंसू बहते है

जिन की खातिर शहर भी छोड़ा, जिन के लिए बदनाम हुए
आज वो भी हम से बेगाने बेगाने से रहते है

वो जो अभी इस राहगुजर से चाक ए गिरेबाँ गुजरा था
उस आवारा दीवाने को जालिब जालिब कहते है


-जालिब

Friday, June 18, 2010

मैं नज़र से पी रहा हूँ, ये समां बदल न जाए
न उठाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न जाए


अभी रात कुछ है बाकि, न उठा नकाब साकी
तेरा रिंद गिरते गिरते, कहीं फिर संभल न जाए

मेरे जिंदगी के मालिक, मेरे दिल पे हाथ रख दे
तेरे आने के ख़ुशी में, मेरा दम निकल न जाए


मेरे अश्क भी है इस में, जो शराब बन रही है
मेरा जाम छूने वाले, तेरा हाथ जल न जाए

मैं बना करू नशेमन किसी शाख-ए-गुल्सिता पे
कहीं साथ आशियाँ के, ये चमन भी जल न जाए

Friday, May 7, 2010

क्या टूटा है.... अन्दर अन्दर, क्यों चेहरा कुम्हलाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर, क्यों चेहरा कुम्हलाया है
तनहा तनहा रोने वालो, कौन तुम्हे याद आया है...........
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
चुपके चुपके सुलगे रहे थे, याद में उनकी दीवाने..
एकतारे में टूट के यारो......
एकतारे में टूट के यारो....क्या उनके समझाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है

रंगबरंगी इस महफ़िल में...
रंगबरंगी इस महफ़िल में, तुम क्यों इतने चुपचुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगो....
भूल भी जाओ पागल लोगो.... क्या खोया क्या पाया है.....
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है

शेर कहा है खून है दिल का ....
शेर कहा है खून है दिल का, जो लफ्जों में बिखरा है
शेर कहा है खून है दिल का......जो लफ्जों में बिखरा है..
दिल के जख्म दिखा कर हमने
दिल के जख्म दिखा कर हमने..महफ़िल को गरमाया है..............
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है

अब 'शहजाद' ये झूट ना बोलो
अब 'शहजाद' ये झूट ना बोलो... वो इतना बेदर्द नहीं
अब 'शहजाद' ये झूट ना बोलो, वो इतना बेदर्द नहीं
अपनी चाहत को भी परखो..
अपनी चाहत को भी परखो, गर इम्जाम लगाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
तनहा तनहा रोने वालो ....
 तनहा तनहा रोने वालो, कौन तुम्हे याद आया है...
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है


- शहजाद

Sunday, March 28, 2010

जिंदगी में तो सभी..

जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है
मैं तो मर कर भी मेरी जाँ तुझे चाहूँगा

तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहबत के लिए थोड़ी है 
एक जरासा गम-ए-दौरा का भी हक है जिस पर
मैंने वो साँस भी तेरे लिए रख छोड़ी है
तुझपे हो जाऊ कुर्बान, तुझे चाहूँगा  
मैं तो मर कर मेरी जाँ तुझे चाहूँगा
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है

अपने जज्बात नगमात रचाने के लिए
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने किस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे
प्यार का बनके निगहबान तुझे चाहूँगा 
मैं तो मर कर मेरी जाँ तुझे चाहूँगा
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है

तेरी हर चाप से जलते हैं ख्यालों में चिराग
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये
तुझको छू लूं तो फिर ऐ जाँ ए तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबु आये
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा 

मैं तो मर कर मेरी जाँ तुझे चाहूँगा
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है

Sunday, February 28, 2010

प्यार भरे दो शर्मीले नैन... जिनसे मिला मेरे दिल को चैन
कोई जाने ना... क्यूँ मुझसे शरमाए... कैसे मुझे तडपाए...

प्यार भरे दो शर्मीले नैन...

दिल ये कहे गीत मैं तेरे गाऊ.. तू ही सुने और मैं गाता जाऊ..
तू जो रहे साथ मेरे ..दुनिया को ठुकराऊ.. तेरा दिल बहलाऊ..

प्यार भरे दो शर्मीले नैन...

रूप तेरा कलियों को शरमाए.. कैसे कोई अपने दिल को बचाए..
पास है तू ..फिर भी जलूँ कौन तुझे समझाए..सावन बीता जाए..

प्यार भरे दो शर्मीले नैन...

डर है मुझे तुझसे बिछड़ ना जाऊ..खो के तुझे मिलने की राह न पाऊ..
ऐसा ना हो ..जब भी तेरा ...नाम लबों पर लाऊ.. मैं आंसू बन जाऊ.. 

प्यार भरे दो शर्मीले नैन...जिनसे मिला मेरे दिल को चैन
कोई जाने ना... क्यूँ मुझसे शरमाए... कैसे मुझे तडपाए...


प्यार भरे दो शर्मीले नैन...


Saturday, January 9, 2010

एक बस तू ही नहीं मुझसे खफ़ा हो बैठा


एक बस तू ही नहीं मुझसे खफ़ा हो बैठा
मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा

उठ के मंजिल ही अगर आये तो शायद कुछ हो
शौक-ए-मंजिल तो मेरा आबलापा हो बैठा

मस्लहत छीन गयी कुवत-ए-गुफ्तार मगर
कुछ न कहना ही मेरा मेरी सदा हो बैठा

शुक्रिया ऐ मेरे कातिल ऐ मसीहा मेरे
जहर जो तुने दिया था वो दवा हो बैठा

जाने 'शहजाद' को मिनजुम्ला ए आदा पा कर
हुक वो उठी के जी तन से जुदा हो बैठा



- फरहत शहजाद


मराठी अनुरूप 


एक फक्त तूच नाही माझ्याशी नाराज होऊन बसला
मी जो दगड कोरला तो देव होऊन बसला

उठून ध्येयच जर आले तर कदाचित काही घटेल
वांच्छित उद्देश तर माझा अपंग होऊन बसला

हितगुज निसटुन गेली बातचीतची करामत परंतु
काही न बोलण ही माझं, माझा आवाज होऊन बसला

उपकृत ए माझ्या मारका ए संजीवका माझ्या
विष-अग्नी जो तू दिला होता तो जल-अमृत होऊन बसला

'शहजाद' च्या जीवाला एकूण-एक सर्व शत्रू मिळवून
वेदना जी उठली की जीव शरीराहून विभक्त होऊन बसला


- फरहत शहजाद

Monday, January 4, 2010

यूँ जिंदगी की राहों में....

यूँ... जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....
इक रोशनी अंधेरों में बिखरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....

वो हादसा वो पहली मुलाक़ात क्या कहूँ, कितनी अजब थी सूरते हालात क्या कहूँ
वो कहर वो गज़ब वो जफा मुझको याद है,
वो उसकी बेरुखी की अदा मुझको याद है,
मिटता नहीं  है जहेन से यूँ छा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....

पहले वो मुझको देखकर बरहम सी हो गई,
पहले..वो मुझको देखकर बरहम सी हो गई, फिर अपने ही नसीब खयालों में खो गई
बेचारगी पे मेरे उसे रहम आ गया,
शायद मेरे तड़पने का अंदाज भा गया,
सांसों से भी करीब मेरे आ गया कोई...
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....

अब उस गिले तबाह की हालत ना पूछिये,
अब उस गिले तबाह की हालत ना पूछिये, बेनाम आरजू की लजत ना पूछिये
इक अजनबी था रूह का अरमान बन गया,
इक हादसा था प्यार का उनवान बन गया,
मंजिल का रास्ता मुझे दिखला गया कोई...
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....

इक रोशनी अंधेरों में बिखरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई


यूँ जिंदगी की राहों में....

Monday, December 28, 2009

बात करनी मुझे मुश्किल

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसे अब है तेरी महफ़िल, कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-करार
बेकरारी तुझे ऐ दिल, कभी ऐसी तो न थी

उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
के तबीअत मेरी माइल, कभी ऐसी
तो न थी

चश्मे-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई कातिल, कभी ऐसी
तो न थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फर' से हर बार
ख़ु तेरी हुरश्माइल, कभी ऐसी
तो न थी

- बहादुरशाह ज़फर




Sunday, December 27, 2009

कैसे छुपाऊं..

कैसे छुपाऊं राजे-गम, दीदा-ए-तर को क्या करूँ
दिल की तपिश को क्या करूँ, सोजे-जिगर को क्या करूँ

शोरिशे-आशिक़ी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूँ

ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूँ बसर
सब ये क़ुबूल है मगर, खौफे-सहर को क्या करूँ

हाल मेरा था जब बतर, तब न हुई तुम्हें खबर
बाद मेरे हुआ असर, अब मैं असर को क्या करूँ

- हसरत मोहानी