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Friday, June 8, 2012

क्या खबर थी....

क्या खबर थी के मैं इस दर्ज़ा बदल जाऊंगा
तुझको खो दूँगा तेरे ग़म से संभल जाऊंगा


अजनबी बनके मिलूँगा मैं तुझे महफ़िल में
तुने छेड़ी भी तो मैं बात बदल जाऊंगा


ढूंढ़ पाए ना जहाँ याद भी तेरी मुझको
ऐसे जंगल में किसी रोज निकल जाऊंगा


जिद में आए हुए मासूम बच्चे की तरह
खुद ही कश्ती को डूबोने पे मचल जाऊंगा

Monday, December 26, 2011

हस्ती अपनी..

हस्ती अपनी हबाब की सी है
यह नुमाइश सराब की सी है

नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिये
पंखड़ी इक गुलाब की सी है

मैं जो बोला कहा की यह आवाज़
उसी ख़ाना ख़राब की सी है

बार बार उसके दर पे जाता हूँ
हालत अब इज़तिराब की सी है

मीर उन नीम बाज़ आंखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

- मीर तक़ी मीर

Sunday, September 11, 2011

मुद्दतों हम पे गम उठाये हैं 
तब कहीं जाके मुस्कराए हैं
एक निगाह-ए-खुलूस के खातिर 
जिंदगी भर फरेब खाए हैं

मुझे फिर वही याद आने लगे है
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे है

सुना है हमें वो बुलाने लगे है
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे है

यह कहना है उनसे मोहब्बत है मुझको
यह कहने में उनसे ज़माने लगे है

क़यामत यक़ीनन करीब आ गयी है
खुमार अब तो मस्जिद में जाने लगे है

Thursday, January 6, 2011

फैसला तुमको भूल जाने का
एक नया ख्वाब है दीवाने का

दिल कली का लरज लरज उठा
जिक्र था फिर बहार आने का

हौसला कम किसी में होता है
जीत कर खुद ही हार जाने का

जिंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का

आप शहजाद की ना फिक्र करें
वो तो आदि है जख्म खाने का

- शहजाद

Monday, June 21, 2010

कुछ देर तक......

कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो..........
माना जिंदगी है तनहा सफ़र..... इल्तजा यही है जाने जिगर

मुझको फ़िक्र है आगाज़ की..... देखो ना सपना अंजाम का..... सदियों की बेताबियाँ खत्म हो.... इक पल मिले जो आराम का............

रहता नहीं संग कोई सदा...... जाने वफ़ा है मुझको पता ... दो चार लम्हा रहो तुम रूबरू..... दिल तुमसे कहना यही चाहता ......
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो................
माना जिंदगी है तनहा सफ़र..... इल्तजा यही है जाने जिगर

कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो..........
साथ चलो..........
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो....

Sunday, November 29, 2009

काश....

काश ऐसा कोई मंजर होता..
काश ऐसा कोई मंजर होता..
मेरे काँधे पे तेरा सर होता...
काश ऐसा कोई मंजर होता..
मेरे काँधे पे तेरा सर होता..
काश ऐसा कोई मंजर होता..

जमा करता जो मैं आये हुए संग
जमा करता जो मैं आये हुए संग
सर छुपाने के लिए घर होता..
सर छुपाने के लिए घर होता..
मेरे काँधे पे तेरा सर होता...
काश ऐसा कोई मंजर होता..

इस बलंदी पे बहोत तनहा हूँ
तनहा हूँ
बहोत तनहा
तनहा तनहा 
इस बलंदी पे बहोत तनहा हूँ
काश मैं सब के बराबर होता..
काश मैं सब के बराबर होता..
मेरे काँधे पे तेरा सर होता...
काश ऐसा कोई मंजर होता..


उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे
उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे
वरना इक और कलंदर होता..
वरना इक और कलंदर होता..
मेरे काँधे पे तेरा सर होता...
काश ऐसा कोई मंजर होता..


मेरे काँधे पे तेरा सर होता...
काश ऐसा कोई मंजर होता..
काश....