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Sunday, December 6, 2009

रोना आया


ए मोहबत तेरे अंज़ाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया


यूँ तो हर शाम उमीदों पे गुजर जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया


कभी तक़दीर का मातम, कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क में हर गाम पे रोना आया


मुझपे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी
इस कदर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया


जब हुआ जिक्र ज़माने में मोहबत का 'शकील'
मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया


-शकील

Sunday, November 15, 2009

मेरे हमनफस मेरे हम नवाँ


 मेरे हमनफस मेरे हम नवाँ मुझे दोस्त बनके दगा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क से जान वलब, मुझे जिंदगी की दुआ न दे


मेरे दाग-ए-दिल से है रोशनी, उसी रोशनी से है जिंदगी
मुझे डर है अए चारागर, ये चराग तू ही बुझा न दे


कभी जाम लब पे लगा दिया कभी मुस्कुराके हटा दिया
तेरे छेड़-छाड़ में साथिया, मेरी तशनगी को बढ़ा न दे



मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये तेरी नवाजिश-ए-मुख्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे


मेरा अज़्म इतना बलंद है के पराये शोलों का डर नहीं
मुझे खौफ आतिशे गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे


वो उठे हैं लेके होम-ओ-सुब्बू, अरे ओ 'शकील'  कहाँ है तू
तेरा जाम लेने को बज्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे




-'शकील'