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Friday, October 14, 2011

यह आलम...

यह आलम शौक का देखा ना जाए
वोह बुत है या खुदा देखा ना जाए

यह किन नज़रों से तुमने आज देखा
के तेरा देखना देखा ना जाए

हमेशा के लिए मुझसे बिछड़ जा
यह मंज़र बारहां देखा न जाए 

गलत है जो सुना पर आजमा कर
तुझे ऐ बावफा देखा ना जाए

यह महरूमी नहीं पास-ऐ-वफ़ा है
कोई तेरे सिवा देखा ना जाए

फ़राज़ अपने सिवा है कौन तेरा
तुझे तुझसे जुदा देखा ना जाये

- अहमद फ़राज़

Thursday, April 28, 2011

जिंदगी से...

जिंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहोत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं
एक मुसाफिर भी काफ़िला है मुझे

दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाइश थी आबला है मुझे

लब कुषा हूँ तो इस यकीन के साथ
क़त्ल होने का हौसला है मुझे

कौन जाने के चाहतो में 'फ़राज़'
क्या गवायाँ क्या मिला है मुझे

- अहमद फ़राज़

Thursday, April 21, 2011

फिर....

फिर  उसी  राह  गुज़र  कर  शायद
हम  कभी  मिल  सकें  मगर  शायद

जान  पहचान  से  क्या  होगा
फिर  भी  ऐ  दोस्त  गौर  कर  शायद

मुन्तजिर  जिनके  हम  रहे  उनको
मिल  गए  और  हम  सफ़र  शायद

जो  भी  बिछड़े  हैं  कब  मिले  हैं  'फ़राज़'
फिर  भी  तू  इंतज़ार  कर  शायद

- अहमद  फ़राज़

Monday, December 21, 2009

खामोश हो क्यों


खामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
बिस्मिल हो तो कातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते

वहशत का सबब रौजने-ज़िंदा तो नहीं है
मेहरो-महो-अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते

एक यह भी तो अंदाजे-इलाजे-गमे-जाँ है
ये चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते

रहजन हो हाजिर है मताए-दिलो-जाँ भी
रहबर हो तो मंजिल का पता क्यूँ नहीं देते

मुंसिफ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

साये हैं अगर हम तो हो क्यों हमसे गुरेजाँ
दीवार अगर हैं तो गिरा क्यूँ नहीं देते

क्या बीत गयी अबके 'फ़राज़' अहले चमन पर
याद आने का कफस मुझको सदा क्यूँ नहीं देते

- अहमद फ़राज़

Wednesday, December 2, 2009

सूना है लोग


सूना  है  लोग  उसे  आँख  भर  के  देखते  हैं 
सो  उस  के  शहर  में  कुछ  दिन  ठहर  के  देखते  हैं 

सूना  है  बोल  तो  बातों  से  फूल  झरते  हैं 
ये  बात  है  तो  चलो  बात  कर  के  देखते  हैं 

सूना  है  रात  उसे  चाँद  तकता  रहता  है 
सितारे  बाम -ए -फलक  से  उतर  के  देखते  हैं 

सूना  है  दिन  को  उसे  तितलियाँ  सताती  हैं 
सूना  है  रात  को  जुगनू  ठहर  के  देखते  हैं 

सूना  है  रब्त  है  उसको  खराब  हालों  से 
सो  अपने  आप  को  बर्बाद  करके  देखते  हैं 

सूना  है  दर्द  की  ग़ाहक  है  चश्म -ए -नाज़  उसकी 
सो  हम  भी  उसकी  गली  से  गुज़र  कर  देखते  हैं 

अब  उसके  शहर  में  ठहरें  के  कुछ  कर  जाएँ
"फ़राज़" आओ  सितारे  सफ़र  के  देखते  हैं

-अहमद फ़राज़