Thursday, April 28, 2011
Tuesday, April 26, 2011
नजर मिला के मेरे पास आ के लूट लिया
नजर हटी थी के फिर मुस्कुरा के लूट लिया
दुहाई है मेरे अलाह की दुहाई है
किसी ने मुझ से मुझी को छुपा के लूट लिया
सलाम उस पे के जिस ने उठा के पर्दा-ए-दिल
मुझी में रह के मुझी में समां के लूट लिया
यहाँ तो खुद तेरी हस्ती है इश्क को दरकार
वो और होंगे जिन्हें मुस्कुरा के लूट लिया
निगाह डाल दी जिस पर हसीं आँखों ने
उसे भी हुस्न-ए-मुजस्सम बना के लूट लिया
- जिगर मुरादाबादी
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Thursday, April 21, 2011
फिर....
फिर उसी राह गुज़र कर शायद
हम कभी मिल सकें मगर शायद
जान पहचान से क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद
मुन्तजिर जिनके हम रहे उनको
मिल गए और हम सफ़र शायद
जो भी बिछड़े हैं कब मिले हैं 'फ़राज़'
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद
- अहमद फ़राज़
हम कभी मिल सकें मगर शायद
जान पहचान से क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद
मुन्तजिर जिनके हम रहे उनको
मिल गए और हम सफ़र शायद
जो भी बिछड़े हैं कब मिले हैं 'फ़राज़'
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद
- अहमद फ़राज़
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Tuesday, April 19, 2011
यार आए न आए...
खुदा ही जाने यार आए न आए
मेरे दिल को करार आए न आए
जवानी में अगर तोबा भी कर ले
किसी को इतबार आए न आए
वो आए भी तो अब शिद्दत-ए-दर्द
खुदा जाने करार आए न आए
इबादत तो है पीरी में भी मुमकिन
जवानी बार बार आए न आए
मेरे दिल को करार आए न आए
जवानी में अगर तोबा भी कर ले
किसी को इतबार आए न आए
वो आए भी तो अब शिद्दत-ए-दर्द
खुदा जाने करार आए न आए
इबादत तो है पीरी में भी मुमकिन
जवानी बार बार आए न आए
Wednesday, April 6, 2011
तू क्या है
हर एक बात पे कहते हो तुम के 'तू क्या है'
तुम ही कहो के यह अंदाजे-गुफ्तगू क्या है
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख़ जुस्तजू क्या है
न शोलें में यह करिश्मा न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वोह शोखे -तुन्द खू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
रही न ताक़ते-गुफ्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है
वोह चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बाड़े -गुल फामे-मुश्कबू क्या है
यह रश्क है के वो होता है हम सुखन तुमसे
वगरना खौफे-बाद आमोज़ी-ए-अदू क्या है
हुआ है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
-ग़ालिब
तुम ही कहो के यह अंदाजे-गुफ्तगू क्या है
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख़ जुस्तजू क्या है
न शोलें में यह करिश्मा न बर्क में ये अदा
कोई बताओ के वोह शोखे -तुन्द खू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
रही न ताक़ते-गुफ्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है
वोह चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बाड़े -गुल फामे-मुश्कबू क्या है
यह रश्क है के वो होता है हम सुखन तुमसे
वगरना खौफे-बाद आमोज़ी-ए-अदू क्या है
हुआ है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
-ग़ालिब
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Sunday, March 20, 2011
नमी सी है..
शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ्न कर दो हमें के साँस मिले
नब्ज कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नहीं कही टिककर
इसकी आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्वीर लाजमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ्न कर दो हमें के साँस मिले
नब्ज कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नहीं कही टिककर
इसकी आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्वीर लाजमी सी है
Sunday, February 20, 2011
अतहर नफीस
ना उड़ा यूँ ठोकरों से मेरी खाक-ए-कब्र जालिम
यही एक रह गयी है मेरे प्यार की निशानी
तुझे पहली ही कहा था हैं जहाँ सराह-ए-फ़ानी
दिल-ए-बदनसीब तुने मेरी बात ही न मानी
यही एक रह गयी है मेरे प्यार की निशानी
तुझे पहली ही कहा था हैं जहाँ सराह-ए-फ़ानी
दिल-ए-बदनसीब तुने मेरी बात ही न मानी
सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं
कभी कहाँ ना किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को
सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा दूँ गरीब खाने को
न जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को
सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा दूँ गरीब खाने को
जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का हैं जिसमें अब ज़िंदा हूँ मैं
एक मौसम रूह का हैं जिसमें अब ज़िंदा हूँ मैं
मेरे होंठो का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तुने मुझको बाग जाना देख ले सेहरा हूँ मैं
तुने मुझको बाग जाना देख ले सेहरा हूँ मैं
देखिए मेरी पजीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त की दहलीज़ पर आया हूँ मैं
लम्हा भर को वक़्त की दहलीज़ पर आया हूँ मैं
इसका रोना नहीं क्यूँ तुम ने किया दिल बरबाद
इस का गम है के बहोत देर में बरबाद किया
मुझ को तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद
लोग कहते के तुम ने मुझे बरबाद किया
इस का गम है के बहोत देर में बरबाद किया
मुझ को तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद
लोग कहते के तुम ने मुझे बरबाद किया
- अतहर नफीस
Wednesday, January 26, 2011
Saturday, January 15, 2011
वो अजीब शख्स था....
वो अजीब शख्स था भीड़ मैं जो नज़र मैं ऐसे उतर गया
जिसे देख कर मेरे होंट पर मेरा अपना शेर ठहर गया
कई शेर उस की निगाह से मेरे रुख पे आ के ग़ज़ल बने
वो निराला तर्ज़ -ए -पयाम था जो सुखन की हद से गुज़र गया
वो हर एक लफ्ज़ मैं चाँद था वो हर एक हर्फ़ मैं नूर था
वो चमकते मिसरों का अक्स था जो ग़ज़ल में खुद ही संवर गया
जो लिखूं तो नोक -ए -कलम पे वो , जो पढ़ूं तो नोक -ए -जुबां पे वो
मेरा जौक भी मेरा शौक भी मेरे साथ साथ निखर गया
Thursday, January 6, 2011
फैसला तुमको भूल जाने का
एक नया ख्वाब है दीवाने का
दिल कली का लरज लरज उठा
जिक्र था फिर बहार आने का
हौसला कम किसी में होता है
जीत कर खुद ही हार जाने का
जिंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का
आप शहजाद की ना फिक्र करें
वो तो आदि है जख्म खाने का
- शहजाद
एक नया ख्वाब है दीवाने का
दिल कली का लरज लरज उठा
जिक्र था फिर बहार आने का
हौसला कम किसी में होता है
जीत कर खुद ही हार जाने का
जिंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का
आप शहजाद की ना फिक्र करें
वो तो आदि है जख्म खाने का
- शहजाद
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Saturday, January 1, 2011
सावन बीतो जाये पिहरवा ...
सावन बीतो जाये पिहरवा ...
मन मेरा घबराए..
ऐसो गए परदेस पिया तुम..
ऐसो गए परदेस पिया तुम.. चैन हमें नहीं आये..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मैं लाख जतन कर हारी
मैं लाख जतन कर हार रहीं
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मोरा सैयां मोसे बोले ना..
तू जो नहीं तो ऐसे पिया हम..
तू जो नहीं तो ऐसे पिया हम...जैसे सुना आंगना
जैसे सुना आंगना.. नैन तिहारी राह निहारें..
नैन तिहारी राह निहारें.. नैन को तरसयों ना
मोरा सैयां मोसे बोले ना..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मैं लाख जतन कर हारी
मैं लाख जतन कर हार रहीं
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मोरा सैयां मोसे बोले ना..
सावन बीतो जाये पिहरवा ...
मन मेरा घबराए..
ऐसो गए परदेस पिया तुम..
ऐसो गए परदेस पिया तुम.. चैन हमें नहीं आये..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मैं लाख जतन कर हारी
मैं लाख जतन कर हार रहीं
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मोरा सैयां मोसे बोले ना..
तू जो नहीं तो ऐसे पिया हम..
तू जो नहीं तो ऐसे पिया हम...जैसे सुना आंगना
जैसे सुना आंगना.. नैन तिहारी राह निहारें..
नैन तिहारी राह निहारें.. नैन को तरसयों ना
मोरा सैयां मोसे बोले ना..
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मैं लाख जतन कर हारी
मैं लाख जतन कर हार रहीं
मोरा सैयां मोसे बोले ना..मोरा सैयां मोसे बोले ना..
Monday, December 6, 2010
दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुःख सहते है
हम ने सुना था इस बस्ती में दिलवाले भी रहते है
एक हमे आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं
दुनिया वाले दिलवालों को और बहोत कुछ कहते है
बीत गया सावन का महिना मौसम ने नजरे बदले
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आंसू बहते है
जिन की खातिर शहर भी छोड़ा, जिन के लिए बदनाम हुए
आज वो भी हम से बेगाने बेगाने से रहते है
वो जो अभी इस राहगुजर से चाक ए गिरेबाँ गुजरा था
उस आवारा दीवाने को जालिब जालिब कहते है
हम ने सुना था इस बस्ती में दिलवाले भी रहते है
एक हमे आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं
दुनिया वाले दिलवालों को और बहोत कुछ कहते है
बीत गया सावन का महिना मौसम ने नजरे बदले
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आंसू बहते है
जिन की खातिर शहर भी छोड़ा, जिन के लिए बदनाम हुए
आज वो भी हम से बेगाने बेगाने से रहते है
वो जो अभी इस राहगुजर से चाक ए गिरेबाँ गुजरा था
उस आवारा दीवाने को जालिब जालिब कहते है
-जालिब
Saturday, November 27, 2010
जब से तु ने मुझे दीवाना बना रखा है..
आप गैरोंकी बात करते है..
हमने अपने भी आजमाए है
लोग काँटों से बच के चलते है
हमने फूलों से जख्म खाए है
किस का क्या जो कदमों पर जब इन्हें बंदगी रख दी
हमारी चीज़ थी हमने जानी वहा रख दी
जो दिल माँगा तो वो बोले के ठहरो याद करने दो
जरा सी चीज़ थी हमने खुदा जाने कहा रख दी
निगाह नाज़ से पूछेंगे किस दिन यह जहीन ...तू ने क्या क्या न बनाया तो ये क्या क्या न बना
आ पिया मोरे नैन में...मैं पलक ढाँक तोहे लूँ... ना मैं देखूं और को और न तोहे देखन दूँ
नदी किनारे धुँआ उठे मैं जानू कुछ होय..जिस कारन मैं जोगन बनी कही वो ही न जलता होय..
हमने अपने भी आजमाए है
लोग काँटों से बच के चलते है
हमने फूलों से जख्म खाए है
किस का क्या जो कदमों पर जब इन्हें बंदगी रख दी
हमारी चीज़ थी हमने जानी वहा रख दी
जो दिल माँगा तो वो बोले के ठहरो याद करने दो
जरा सी चीज़ थी हमने खुदा जाने कहा रख दी
संग हर शख्श ने उठाया रखा है
जब से तु ने मुझे दीवाना बना रखा है
जब से तु ने मुझे दीवाना बना रखा है
निगाह नाज़ से पूछेंगे किस दिन यह जहीन ...तू ने क्या क्या न बनाया तो ये क्या क्या न बना
उसके दिल पर भी कड़ी इश्क में गुजरी होगी
नाम जिसने भी मुहब्बत का सजा रखा है
नाम जिसने भी मुहब्बत का सजा रखा है
आ पिया मोरे नैन में...मैं पलक ढाँक तोहे लूँ... ना मैं देखूं और को और न तोहे देखन दूँ
पत्थरों.. आज मेरे सर पे बरसते क्यूँ हो
दुनिया बड़ी बावरी पत्थर पूजने जाये..घरकी चक्की कोई न पूजे जिसका पिसा खाए मैंने तुमको भी कभी अपना खुदा रखा है
अब मेरे दीद की दुनिया भी तमाशाई है
तुने क्या मुझके मुहब्बत में बना रखा है
तुने क्या मुझके मुहब्बत में बना रखा है
नदी किनारे धुँआ उठे मैं जानू कुछ होय..जिस कारन मैं जोगन बनी कही वो ही न जलता होय..
पि जा अय्याम की कल्बी को भी हसके नासीर
हम को सहने में भी कुदरत ने मजा रखा है
हम को सहने में भी कुदरत ने मजा रखा है
जब से तु ने मुझे दीवाना बना रखा है............
Thursday, November 11, 2010
वह सूरतें इलाही किस देस बस्तियाँ है..
अब जिनके देखनेको आँखे तरस्तियाँ है..
बरसात का तो मौसम कब का निकल गया पर
मिजगां की यह घटायें अब तक बरस्तियाँ है..
क्यों कर ना हो यह ज़ख्मी शीशा सा दिल हमारा
उस शौक की निगाहें पत्थर में धस्तियाँ है..
कीमत में उनकी गो हम दो जुग को दे चुके है..
उस यार की निगाहें किस पर भी सस्तियाँ है..
जब मैं कहा यह उसे सौदा को अपने मिलके..
इस साल तू है साकी और मैं परस्तियाँ है..
अब जिनके देखनेको आँखे तरस्तियाँ है..
बरसात का तो मौसम कब का निकल गया पर
मिजगां की यह घटायें अब तक बरस्तियाँ है..
क्यों कर ना हो यह ज़ख्मी शीशा सा दिल हमारा
उस शौक की निगाहें पत्थर में धस्तियाँ है..
कीमत में उनकी गो हम दो जुग को दे चुके है..
उस यार की निगाहें किस पर भी सस्तियाँ है..
जब मैं कहा यह उसे सौदा को अपने मिलके..
इस साल तू है साकी और मैं परस्तियाँ है..
Monday, October 4, 2010
वो जो हम में तुम में करार था , तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का , तुम्हें याद हो के न याद हो
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर , वो करम के हाथ मेरे हाल पर
मुझे सब हैं याद ज़रा ज़रा , तुम्हें याद हो के न याद हो
वो नए गिले वो शिकायतें , वो मज़े मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना , तुम्हें याद हो के न याद हो
कोई बात ऎसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयां से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो
सुनो ज़िक्र है कई साल का , कोई वादा मुझ से था आप का
वो निबाहने का तो ज़िक्र क्या , तुम्हें याद हो के न याद हो
कभी हममें तुम में भी चाह थी , कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना , तुम्हें याद हो के न याद हो
हुए इत्तेफाक से गर बहम , वो वफ़ा जताने को दम -बा -दम
गिला -ए-मलामत -ए -अर्क़बा , तुम्हें याद हो के न याद हो
कभी बैठे सब हैं जो रू -ब-रू तो इशारतों ही से गुफ्तगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो के न याद हो
वो बिगड़ना वस्ल की रात का , वो न मानना किसी बात का
वो नहीएँ नहीं की हर आन अदा , तुम्हें याद हो के न याद हो
जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ "मोमिन "-ए -मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का , तुम्हें याद हो के न याद हो
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर , वो करम के हाथ मेरे हाल पर
मुझे सब हैं याद ज़रा ज़रा , तुम्हें याद हो के न याद हो
वो नए गिले वो शिकायतें , वो मज़े मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना , तुम्हें याद हो के न याद हो
कोई बात ऎसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयां से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो
सुनो ज़िक्र है कई साल का , कोई वादा मुझ से था आप का
वो निबाहने का तो ज़िक्र क्या , तुम्हें याद हो के न याद हो
कभी हममें तुम में भी चाह थी , कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना , तुम्हें याद हो के न याद हो
हुए इत्तेफाक से गर बहम , वो वफ़ा जताने को दम -बा -दम
गिला -ए-मलामत -ए -अर्क़बा , तुम्हें याद हो के न याद हो
कभी बैठे सब हैं जो रू -ब-रू तो इशारतों ही से गुफ्तगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो के न याद हो
वो बिगड़ना वस्ल की रात का , वो न मानना किसी बात का
वो नहीएँ नहीं की हर आन अदा , तुम्हें याद हो के न याद हो
जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ "मोमिन "-ए -मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो
Saturday, September 18, 2010
किसको कातिल मैं कहूँ किसको मसीहा समझूँ..
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है किसे क्या समझूँ...
सब यहाँ दोस्त ही बैठे है किसे क्या समझूँ...
वो भी क्या दिन थे के हर वहम यकीन होता था...
अब हकीक़त नज़र आये तो उसे क्या समझूँ..
दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे..
ऐसे माहौल में अब किस को पराया समझूँ..
जुल्म यह है के है यकता तेरी बेगानारवी
लुफ़्त यह है के मैं अब तक तुझे अपना समझूँ...
Video _ http://www.youtube.com/watch?v=TSJlQWhC-dc&feature=player_embedded#!
Sunday, August 29, 2010
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी..
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी..
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...यह नजराना तेरा भी है और मेरा भी...
अपने गमको गीत बनाकर गा लेना..
अपने गमको गीत बनाकर गा लेना..
राग पुराना तेरा भी है... मेरा भी..
राग पुराना तेरा भी है.. मेरा भी..
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...
तू मुझको और मैं तुझको समझाऊ क्या..
तू मुझको और मैं तुझको समझाऊ क्या..
दिल दीवाना तेरा भी है.. मेरा भी..
दिल दीवाना तेरा भी है.. मेरा भी..
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...
शहर में गलियों-गलियों जिसका चर्चा है..
शहर में गलियों-गलियों जिसका चर्चा है..
वो अफसाना तेरा भी है.. मेरा भी..
मयखाना की बात ना कर वाइज मुझसे..
आना-जाना तेरा भी.. मेरा भी..
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...
यह नजराना तेरा भी है और मेरा भी...
गम का खजाना तेरा भी है.. मेरा भी...
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लता मंगेशकर
Sunday, August 22, 2010
तुझ लब की सिफत, लाल-ऐ-बदक्शासु कहूँगा..
जादू है तेरे नैन, जादू है तेरे नैन गज़लासु कहूँगा..
जलता हूँ शब-ओ-रोज तेरे गम में ऐ साजन..
ऐ सोज तेरा निसाल-ऐ- सोजासु कहूँगा ..
देखा हूँ तुझे ख्वाब में ऐ माया-ऐ-ख़ुबी
इस ख्वाब को जा उसफ-ऐ-तहनासु कहूँगा..
मुझ पर ना करो जुल्म तुम ऐ लैल-ऐ-खूबा
मजनू हूँ तेरे गम को बयाबासु कहूँगा..
एकनुक्ता तेरे सफा-ऐ-रुख पर नहीं बेजां
इस मुख को सफा-ऐ-ख़ुरासु कहूँगा..
http://www.youtube.com/watch?v=OrrjQi0uS0o
जादू है तेरे नैन, जादू है तेरे नैन गज़लासु कहूँगा..
जलता हूँ शब-ओ-रोज तेरे गम में ऐ साजन..
ऐ सोज तेरा निसाल-ऐ- सोजासु कहूँगा ..
देखा हूँ तुझे ख्वाब में ऐ माया-ऐ-ख़ुबी
इस ख्वाब को जा उसफ-ऐ-तहनासु कहूँगा..
मुझ पर ना करो जुल्म तुम ऐ लैल-ऐ-खूबा
मजनू हूँ तेरे गम को बयाबासु कहूँगा..
एकनुक्ता तेरे सफा-ऐ-रुख पर नहीं बेजां
इस मुख को सफा-ऐ-ख़ुरासु कहूँगा..
http://www.youtube.com/watch?v=OrrjQi0uS0o
Sunday, July 25, 2010
तुम्हें दिललगी भूल जानी पड़ेगी.....मोहब्बत की राहों में आकर तो देखो
तड़पने पे मेरे ना फिर तुम हसोगे.. कभी दिल किसी से लगा कर तो देखो
होठों के पास आये हसीं क्या मजाल है..दिल का मुहमल्ला है कोई दिललगी नहीं
जख्म पे जख्म खा के ज़ी अपने लहू के घुट प़ी.. आह ना कर लबों को स़ी..इश्क है दिललगी नहीं
दिल लगाकर पता चलेगा तुम्हें ...आशकी की दिललगी नहीं होती..

कुछ खेल नहीं है इश्क की लाग....पानी न समझ है आग है आग
खूँ रुलाएगी यह लगी दिलकी..खेल समझो न दिललगी दिलकी
यह इश्क नहीं आसाँ.. बस इतना समझ लीजिये..इक आग का दरया है..और डूब के जाना है
तुम्हें दिललगी भूल जानी पड़ेगी.....मोहब्बत की राहों में आकर तो देखो
मोहब्बत की राहों में आकर तो देखो..तड़पने पे मेरे ना फिर तुम हसोगे..
तड़पने पे मेरे ना फिर तुम हसोगे..कभी दिल किसी से लगा कर तो देखो
Saturday, July 17, 2010
मेरे दिल में तेरी यादों के साए
हवा जैसे खंडहर में सरसराए
हम ही ने सब के गम को अपना जाना
हम ही ने सब के हाथों जख्म पाए
दिल-ए-बेताब की उस्तअद तो देखो
ज़माने भर के इसमें गम समाए
किसीने प्यार से जब भी पुकारा
तो पलकों पर सितारे झिलमिलाए
शब्-ए-फ़ुर्कत हविक आहट पे मुझको
यही धोखा हुआ शायद वो आए
ख़ुशी दी है ज़माने भर को इमदाद
अगरचे उम्रभर आँसू बहाए
http://www.youtube.com/watch?v=TcDqUQzp0xs&feature
हवा जैसे खंडहर में सरसराए
हम ही ने सब के गम को अपना जाना
हम ही ने सब के हाथों जख्म पाए
दिल-ए-बेताब की उस्तअद तो देखो
ज़माने भर के इसमें गम समाए
किसीने प्यार से जब भी पुकारा
तो पलकों पर सितारे झिलमिलाए
शब्-ए-फ़ुर्कत हविक आहट पे मुझको
यही धोखा हुआ शायद वो आए
ख़ुशी दी है ज़माने भर को इमदाद
अगरचे उम्रभर आँसू बहाए
http://www.youtube.com/watch?v=TcDqUQzp0xs&feature
Tuesday, July 6, 2010
..आँधी चली ...
जब तक बिका न था....
जब तक बिका न था.. तो कोई पूछता न था
जब तक बिका न था तो कोई पूछता न था
तुने मुझे खरीद कर... अनमोल कर दिया
जो मैं ऐसा जानती.......
जो मैं ऐसा जानती प्रीत की दुख होय
नगर ढंढोरा पिटती.....
नगर ढंढोरा पिटती प्रीत न करियो कोय
Source :- http://parulchaandpukhraajkaa.blogspot.com
जब तक बिका न था.. तो कोई पूछता न था
जब तक बिका न था तो कोई पूछता न था
तुने मुझे खरीद कर... अनमोल कर दिया
आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला
आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला
दिल जिससे मिल गया वो दुबारा नहीं मिला
आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला
हम अंजुमन में सब की तरफ देखते रहे
हम अंजुमन में सब की तरफ देखते रहे
हम अंजुमन में सब की तरफ देखते रहे....अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला
अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला........
आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला
दिल जिससे मिल गया वो दुबारा नहीं मिला
आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला
दिल जिससे मिल गया वो दुबारा नहीं मिला...आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला...............
हम अंजुमन में सब की तरफ देखते रहे
हम अंजुमन में सब की तरफ देखते रहे
हम अंजुमन में सब की तरफ देखते रहे....अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला
अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला........
दिल जिससे मिल गया वो दुबारा नहीं मिला...आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला...........
जो मैं ऐसा जानती.......
जो मैं ऐसा जानती प्रीत की दुख होय
नगर ढंढोरा पिटती.....
नगर ढंढोरा पिटती प्रीत न करियो कोय
आवाज को तो कौन समझता की दूर दूर
आवाज को तो कौन... समझता की दूर दूर.......
खामोशियों का दर्द शनासा नहीं मिला
................खामोशियों का दर्द शनासा नहीं मिला...
कच्चे घड़े ने जीत ली....जीत ली.......
कच्चे ...कच्चे..कच्चे...कच्चे घड़े ने जीत ली
कच्चे घड़े ने जीत ली नदी चढ़ी हुई...
मजबूत कश्तियों को किनारा नहीं मिला..
मजबूत कश्तियों को किनारा नहीं मिला....
..आँधी चली ...
आवाज को तो कौन... समझता की दूर दूर.......
खामोशियों का दर्द शनासा नहीं मिला
................खामोशियों का दर्द शनासा नहीं मिला...
दिल जिससे मिल गया वो दुबारा नहीं मिला...आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला.................
कच्चे घड़े ने जीत ली....जीत ली.......
कच्चे ...कच्चे..कच्चे...कच्चे घड़े ने जीत ली
कच्चे घड़े ने जीत ली नदी चढ़ी हुई...
मजबूत कश्तियों को किनारा नहीं मिला..
मजबूत कश्तियों को किनारा नहीं मिला....
दिल जिससे मिल गया वो दुबारा नहीं मिला...आँधी चली तो नक़्शे-कफ़-ए-पा नहीं मिला.............
..आँधी चली ...
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Sunday, July 4, 2010
नसीर
तर्के-तअल्लुकात पे रोया ना तू न मैं
लेकिन यह क्या के चैन से सोया ना तू न मैंवो हमसफ़र था मगर उससे हमनवाई न थी
के धुप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी
के धुप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी
कुछ इस अदा से आज वो पहलूनशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे
अदावतें थी तगाफुल था रंजिशें थी मगर
बिछड़ने वाले में सब कुछ था बेवफाई न थी
बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल
बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल
ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी
काजल दारू किरकिरा सुरमा सहा न जाये
जिन नैन में पी बसे दूजा कोन न समाये
किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन सदा तो आयी थी लेकिन कोई दुहाई न थी
कभी यह हाल के दोनों में यकदिली थी नसीर
कभी यह मर्हल्ला जैसे के आशनाई न थी
- नसीर
Source :- http://parulchaandpukhraajkaa.blogspot.com
Thursday, June 24, 2010
अभी से कैसे कहूँ ....तुमको बेवफा साहब
अभी से कैसे कहूँ तुमको बेवफा साहब
अभी तो अपने सफ़र की है इब्तदा साहब
न जाने कितने लकब दे रहा है दिल तुमको
हुजुर जाने वफ़ा और हम नवाँ साहब
तुम्हारी याद में तारे शुमार करती हूँ
न जाने खत्म कहाँ हो यह सिलसिला साहब
तुम्हारा चेहरा मेरे अख्स से उभरता है
न जाने कौन बदलता है आइना साहब

अभी से कैसे कहूँ तुमको बेवफा साहब
अभी तो अपने सफ़र की है इब्तदा साहब
न जाने कितने लकब दे रहा है दिल तुमको
हुजुर जाने वफ़ा और हम नवाँ साहब
तुम्हारी याद में तारे शुमार करती हूँ
न जाने खत्म कहाँ हो यह सिलसिला साहब
तुम्हारा चेहरा मेरे अख्स से उभरता है
न जाने कौन बदलता है आइना साहब

Monday, June 21, 2010
कुछ देर तक......
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो..........
माना जिंदगी है तनहा सफ़र..... इल्तजा यही है जाने जिगर
माना जिंदगी है तनहा सफ़र..... इल्तजा यही है जाने जिगर
मुझको फ़िक्र है आगाज़ की..... देखो ना सपना अंजाम का..... सदियों की बेताबियाँ खत्म हो.... इक पल मिले जो आराम का............
रहता नहीं संग कोई सदा...... जाने वफ़ा है मुझको पता ... दो चार लम्हा रहो तुम रूबरू..... दिल तुमसे कहना यही चाहता ......
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो................
माना जिंदगी है तनहा सफ़र..... इल्तजा यही है जाने जिगर
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो..........
साथ चलो..........
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो....
Friday, June 18, 2010
मैं नज़र से पी रहा हूँ, ये समां बदल न जाए
न उठाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न जाए
अभी रात कुछ है बाकि, न उठा नकाब साकी
तेरा रिंद गिरते गिरते, कहीं फिर संभल न जाए
मेरे जिंदगी के मालिक, मेरे दिल पे हाथ रख दे
तेरे आने के ख़ुशी में, मेरा दम निकल न जाए
न उठाओ तुम निगाहें, कहीं रात ढल न जाए
अभी रात कुछ है बाकि, न उठा नकाब साकी
तेरा रिंद गिरते गिरते, कहीं फिर संभल न जाए
मेरे जिंदगी के मालिक, मेरे दिल पे हाथ रख दे
तेरे आने के ख़ुशी में, मेरा दम निकल न जाए
मेरे अश्क भी है इस में, जो शराब बन रही है
मेरा जाम छूने वाले, तेरा हाथ जल न जाए
मैं बना करू नशेमन किसी शाख-ए-गुल्सिता पे
कहीं साथ आशियाँ के, ये चमन भी जल न जाए
Wednesday, June 9, 2010
आहट सी कोई आये तो लगता है की तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है की तुम हो
जब शाख कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लजत जाए तो लगता है की तुम हो
रस्ते के धुंधलके में किसी मोड़ पे कुछ दूर..
इक लव सी चमक जाए तो लगता है की तुम हो
संदल से महकती हुई कुर्बेफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है की तुम हो
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नदिया कोई बलखाये तो लगता है की तुम हो
जब रात कोई देर किरन मेरे बराबर
चुपचाप से सो जाए तो लगता है की तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है की तुम हो
जब शाख कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लजत जाए तो लगता है की तुम हो
रस्ते के धुंधलके में किसी मोड़ पे कुछ दूर..
इक लव सी चमक जाए तो लगता है की तुम हो
संदल से महकती हुई कुर्बेफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है की तुम हो
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नदिया कोई बलखाये तो लगता है की तुम हो
जब रात कोई देर किरन मेरे बराबर
चुपचाप से सो जाए तो लगता है की तुम हो
- जान निसार अख्तर
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Friday, May 7, 2010
क्या टूटा है.... अन्दर अन्दर, क्यों चेहरा कुम्हलाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर, क्यों चेहरा कुम्हलाया है
तनहा तनहा रोने वालो, कौन तुम्हे याद आया है...........
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
चुपके चुपके सुलगे रहे थे, याद में उनकी दीवाने..
एकतारे में टूट के यारो......
एकतारे में टूट के यारो....क्या उनके समझाया है
एकतारे में टूट के यारो......
एकतारे में टूट के यारो....क्या उनके समझाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
रंगबरंगी इस महफ़िल में...
रंगबरंगी इस महफ़िल में, तुम क्यों इतने चुपचुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगो....
भूल भी जाओ पागल लोगो.... क्या खोया क्या पाया है.....
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
रंगबरंगी इस महफ़िल में, तुम क्यों इतने चुपचुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगो....
भूल भी जाओ पागल लोगो.... क्या खोया क्या पाया है.....
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
शेर कहा है खून है दिल का ....
शेर कहा है खून है दिल का, जो लफ्जों में बिखरा है
शेर कहा है खून है दिल का......जो लफ्जों में बिखरा है..
दिल के जख्म दिखा कर हमने
दिल के जख्म दिखा कर हमने..महफ़िल को गरमाया है..............
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
शेर कहा है खून है दिल का, जो लफ्जों में बिखरा है
शेर कहा है खून है दिल का......जो लफ्जों में बिखरा है..
दिल के जख्म दिखा कर हमने
दिल के जख्म दिखा कर हमने..महफ़िल को गरमाया है..............
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
अब 'शहजाद' ये झूट ना बोलो
अब 'शहजाद' ये झूट ना बोलो... वो इतना बेदर्द नहीं
अब 'शहजाद' ये झूट ना बोलो, वो इतना बेदर्द नहीं
अपनी चाहत को भी परखो..
अपनी चाहत को भी परखो, गर इम्जाम लगाया है
अपनी चाहत को भी परखो, गर इम्जाम लगाया है
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
तनहा तनहा रोने वालो ....
तनहा तनहा रोने वालो, कौन तुम्हे याद आया है...
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
तनहा तनहा रोने वालो, कौन तुम्हे याद आया है...
क्या टूटा है अन्दर अन्दर...क्यों चेहरा कुम्हलाया है
- शहजाद
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Sunday, April 18, 2010
Sunday, March 28, 2010
जिंदगी में तो सभी..
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है
मैं तो मर कर भी मेरी जाँ तुझे चाहूँगा
तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहबत के लिए थोड़ी है
एक जरासा गम-ए-दौरा का भी हक है जिस पर
मैंने वो साँस भी तेरे लिए रख छोड़ी है
तुझपे हो जाऊ कुर्बान, तुझे चाहूँगा
मैं तो मर कर मेरी जाँ तुझे चाहूँगा
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है
अपने जज्बात नगमात रचाने के लिए
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने किस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे
प्यार का बनके निगहबान तुझे चाहूँगा
मैं तो मर कर मेरी जाँ तुझे चाहूँगा
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है
तेरी हर चाप से जलते हैं ख्यालों में चिराग
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये
तुझको छू लूं तो फिर ऐ जाँ ए तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबु आये
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये
तुझको छू लूं तो फिर ऐ जाँ ए तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबु आये
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा
मैं तो मर कर मेरी जाँ तुझे चाहूँगा
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है
Sunday, March 7, 2010
Friday, March 5, 2010
तेरे आने का धोखा सा रहा है
दिया सा रात भर जलता रहा है
अजब है रात से आँखों का आलम
ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है
सुना है रात भर बरसा है बादल
मगर वो शहर जो प्यासा रहा है
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
जो पिछली रात से याद आ रहा है
किसे ढून्दोगे इन गलियों में 'नासिर'
चलो अब घर चले दिन जा रहा है
- नासिर
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Sunday, February 28, 2010
प्यार भरे दो शर्मीले नैन... जिनसे मिला मेरे दिल को चैन
कोई जाने ना... क्यूँ मुझसे शरमाए... कैसे मुझे तडपाए...
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
दिल ये कहे गीत मैं तेरे गाऊ.. तू ही सुने और मैं गाता जाऊ..
तू जो रहे साथ मेरे ..दुनिया को ठुकराऊ.. तेरा दिल बहलाऊ..
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
रूप तेरा कलियों को शरमाए.. कैसे कोई अपने दिल को बचाए..
पास है तू ..फिर भी जलूँ कौन तुझे समझाए..सावन बीता जाए..
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
डर है मुझे तुझसे बिछड़ ना जाऊ..खो के तुझे मिलने की राह न पाऊ..
ऐसा ना हो ..जब भी तेरा ...नाम लबों पर लाऊ.. मैं आंसू बन जाऊ..
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...जिनसे मिला मेरे दिल को चैन
कोई जाने ना... क्यूँ मुझसे शरमाए... कैसे मुझे तडपाए...
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
कोई जाने ना... क्यूँ मुझसे शरमाए... कैसे मुझे तडपाए...
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
दिल ये कहे गीत मैं तेरे गाऊ.. तू ही सुने और मैं गाता जाऊ..
तू जो रहे साथ मेरे ..दुनिया को ठुकराऊ.. तेरा दिल बहलाऊ..
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
रूप तेरा कलियों को शरमाए.. कैसे कोई अपने दिल को बचाए..
पास है तू ..फिर भी जलूँ कौन तुझे समझाए..सावन बीता जाए..
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
डर है मुझे तुझसे बिछड़ ना जाऊ..खो के तुझे मिलने की राह न पाऊ..
ऐसा ना हो ..जब भी तेरा ...नाम लबों पर लाऊ.. मैं आंसू बन जाऊ..
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...जिनसे मिला मेरे दिल को चैन
कोई जाने ना... क्यूँ मुझसे शरमाए... कैसे मुझे तडपाए...
प्यार भरे दो शर्मीले नैन...
Thursday, February 11, 2010
Sunday, January 31, 2010
आबिदा परवीन
रंग बातें करें और बातों से खुशबू आए
दर्द फूलों की तरह महके अगर तू आए
भीग जाती है इस उमीद पे आँखें हर शाम
शायद से रात हो महताब लबेजू आए
हम तेरी याद से कतरा के गुजर जाते मगर
राह में फूलों के लब सायों के गेसू आए
आजमाए इश्क की घडी से गुजर आए तो जिया
जशन-ए-गमदारी हुआ आँख में आंसू आए
Tuesday, January 26, 2010
ग़ालिब
रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो
हमसुखन कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो
बेदार -ओ -दीवार सा इक घर बनाया चाहिए
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो
पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमार -दार
और अगर मर जाइए तो , नौहा -ख्वाँ कोई न हो
- ग़ालिब
हमसुखन कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो
बेदार -ओ -दीवार सा इक घर बनाया चाहिए
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो
पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमार -दार
और अगर मर जाइए तो , नौहा -ख्वाँ कोई न हो
- ग़ालिब
Saturday, January 9, 2010
एक बस तू ही नहीं मुझसे खफ़ा हो बैठा
मैंने जो संग तराशा वो खुदा हो बैठा
उठ के मंजिल ही अगर आये तो शायद कुछ हो
शौक-ए-मंजिल तो मेरा आबलापा हो बैठा
मस्लहत छीन गयी कुवत-ए-गुफ्तार मगर
कुछ न कहना ही मेरा मेरी सदा हो बैठा
शुक्रिया ऐ मेरे कातिल ऐ मसीहा मेरे
जहर जो तुने दिया था वो दवा हो बैठा
जाने 'शहजाद' को मिनजुम्ला ए आदा पा कर
हुक वो उठी के जी तन से जुदा हो बैठा
- फरहत शहजाद
मराठी अनुरूप
एक फक्त तूच नाही माझ्याशी नाराज होऊन बसला
मी जो दगड कोरला तो देव होऊन बसला
उठून ध्येयच जर आले तर कदाचित काही घटेल
वांच्छित उद्देश तर माझा अपंग होऊन बसला
हितगुज निसटुन गेली बातचीतची करामत परंतु
काही न बोलण ही माझं, माझा आवाज होऊन बसला
उपकृत ए माझ्या मारका ए संजीवका माझ्या
विष-अग्नी जो तू दिला होता तो जल-अमृत होऊन बसला
'शहजाद' च्या जीवाला एकूण-एक सर्व शत्रू मिळवून
वेदना जी उठली की जीव शरीराहून विभक्त होऊन बसला
मी जो दगड कोरला तो देव होऊन बसला
उठून ध्येयच जर आले तर कदाचित काही घटेल
वांच्छित उद्देश तर माझा अपंग होऊन बसला
हितगुज निसटुन गेली बातचीतची करामत परंतु
काही न बोलण ही माझं, माझा आवाज होऊन बसला
उपकृत ए माझ्या मारका ए संजीवका माझ्या
विष-अग्नी जो तू दिला होता तो जल-अमृत होऊन बसला
'शहजाद' च्या जीवाला एकूण-एक सर्व शत्रू मिळवून
वेदना जी उठली की जीव शरीराहून विभक्त होऊन बसला
- फरहत शहजाद
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Thursday, January 7, 2010
फैज़
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म ए महताब से रात
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है ....
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
और मुश्ताक निगाहों की सुनी जाएगी
और मुश्ताक निगाहों की सुनी जाएगी
और उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हाथ
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है....
उनका आँचल है के रुखसार के पैराहन है
उनका आँचल है के रुखसार के पैराहन है
कुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगीन
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छावओं में
टिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक के नहीं
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है....
आज फिर हुस्न ए दिलारा की वही धज होगी
आज फिर हुस्न ए दिलारा की वही धज होगी
वोही ख्वाबीदा सी आँखें वोही काजल की लकीर
रंग ए रुखसार पे हल्का सा वो गाजे का गुबार
संदली हाथ पे धुंधली सी हिना की तहरीर
अपने अफ़्कार की अशआर की दुनिया है यही
जाने मज़मून है यही शाहिदे माना है यही
अपना मौजू -ए -सुखन इनके सिवा और नहीं
तब्बा शायर का वतन इनके सिवा और नहीं
यह खूँ की महक है के लबे यार की खुशबू
यह खूँ की महक है....
यह खूँ की महक है के लबे यार की खुशबू
किस राह की - जानिब से सबा आती है देखो
गुलशन में बहार आई....
गुलशन में बहार आई के जिंदा हुआ आबाद
किस संद से नगमों की सदा आती है देखो
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म ए महताब से रात
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है.....
- फैज़
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म ए महताब से रात
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है ....
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
और मुश्ताक निगाहों की सुनी जाएगी
और मुश्ताक निगाहों की सुनी जाएगी
और उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हाथ
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है....
उनका आँचल है के रुखसार के पैराहन है
उनका आँचल है के रुखसार के पैराहन है
कुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगीन
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छावओं में
टिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक के नहीं
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है....
आज फिर हुस्न ए दिलारा की वही धज होगी
आज फिर हुस्न ए दिलारा की वही धज होगी
वोही ख्वाबीदा सी आँखें वोही काजल की लकीर
रंग ए रुखसार पे हल्का सा वो गाजे का गुबार
संदली हाथ पे धुंधली सी हिना की तहरीर
अपने अफ़्कार की अशआर की दुनिया है यही
जाने मज़मून है यही शाहिदे माना है यही
अपना मौजू -ए -सुखन इनके सिवा और नहीं
तब्बा शायर का वतन इनके सिवा और नहीं
यह खूँ की महक है के लबे यार की खुशबू
यह खूँ की महक है....
यह खूँ की महक है के लबे यार की खुशबू
किस राह की - जानिब से सबा आती है देखो
गुलशन में बहार आई....
गुलशन में बहार आई के जिंदा हुआ आबाद
किस संद से नगमों की सदा आती है देखो
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म ए महताब से रात
गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
गुल हुई जाती है.....
- फैज़
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Tuesday, January 5, 2010
आँखों को इंतज़ार का
आँखों को इंतज़ार का, दे के हुनर चला गया
चाहा था एक शख्स को, जाने किधर चला गया
दिनकी वो महफिलें गयी, रातों के रत जगें गए
कोई समेट कर मेरे, शामो सहर चला गया
झोंका है एक बहार का, रंग-ए-ख्याल-ए-यार भी
हरसू बिखर बिखर गयी खुशबू, जिधर चला गया
उसके ही दम से दिल में आज, धुप भी चांदनी भी है
दे के वो अपनी याद के, शम्सो क़मर चला गया
कूचा-ब-कूचा दर-ब-दर, कब से भटक रहा है दिल
हमको भुला के राह वो, अपनी डगर चला गया
Monday, January 4, 2010
यूँ जिंदगी की राहों में....
यूँ... जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....
इक रोशनी अंधेरों में बिखरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....
वो हादसा वो पहली मुलाक़ात क्या कहूँ, कितनी अजब थी सूरते हालात क्या कहूँ
वो कहर वो गज़ब वो जफा मुझको याद है,
वो उसकी बेरुखी की अदा मुझको याद है,
मिटता नहीं है जहेन से यूँ छा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....
पहले वो मुझको देखकर बरहम सी हो गई,
पहले..वो मुझको देखकर बरहम सी हो गई, फिर अपने ही नसीब खयालों में खो गई
बेचारगी पे मेरे उसे रहम आ गया,
शायद मेरे तड़पने का अंदाज भा गया,
सांसों से भी करीब मेरे आ गया कोई...
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....
अब उस गिले तबाह की हालत ना पूछिये,
अब उस गिले तबाह की हालत ना पूछिये, बेनाम आरजू की लजत ना पूछिये
इक अजनबी था रूह का अरमान बन गया,
इक हादसा था प्यार का उनवान बन गया,
मंजिल का रास्ता मुझे दिखला गया कोई...
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....
इक रोशनी अंधेरों में बिखरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....
इक रोशनी अंधेरों में बिखरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....
वो हादसा वो पहली मुलाक़ात क्या कहूँ, कितनी अजब थी सूरते हालात क्या कहूँ
वो कहर वो गज़ब वो जफा मुझको याद है,
वो उसकी बेरुखी की अदा मुझको याद है,
मिटता नहीं है जहेन से यूँ छा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....
पहले वो मुझको देखकर बरहम सी हो गई,
पहले..वो मुझको देखकर बरहम सी हो गई, फिर अपने ही नसीब खयालों में खो गई
बेचारगी पे मेरे उसे रहम आ गया,
शायद मेरे तड़पने का अंदाज भा गया,
सांसों से भी करीब मेरे आ गया कोई...
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....
अब उस गिले तबाह की हालत ना पूछिये,
अब उस गिले तबाह की हालत ना पूछिये, बेनाम आरजू की लजत ना पूछिये
इक अजनबी था रूह का अरमान बन गया,
इक हादसा था प्यार का उनवान बन गया,
मंजिल का रास्ता मुझे दिखला गया कोई...
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई..
यूँ जिंदगी की राहों में....
इक रोशनी अंधेरों में बिखरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में टकरा गया कोई
यूँ जिंदगी की राहों में....
कैसर
मेरी आँखों को आँखों का किनारा कौन दे गा
समंदर को समंदर में सहारा कौन दे गा
मेरे चेहरे को चेहरा कब इनायत कर रहे हो
तुम्हें मेरे सिवा चेहरा तुम्हारा कौन दे गा
मुहब्बत नीला मौसम बन के आ जाएगी इक दिन
गुलाबी तितलियों को फिर सहारा कौन दे गा
मेरी आवाज़ में आवाज़ किस क़ी बोलती है
मेरे गीतों को गीतों का किनारा कौन दे गा
बदन में एक सहरा जल रहा है बुझ रहा है
मेरे दरयाओं को 'कैसर' इशारा कौन दे गा
समंदर को समंदर में सहारा कौन दे गा
मेरे चेहरे को चेहरा कब इनायत कर रहे हो
तुम्हें मेरे सिवा चेहरा तुम्हारा कौन दे गा
मुहब्बत नीला मौसम बन के आ जाएगी इक दिन
गुलाबी तितलियों को फिर सहारा कौन दे गा
मेरी आवाज़ में आवाज़ किस क़ी बोलती है
मेरे गीतों को गीतों का किनारा कौन दे गा
बदन में एक सहरा जल रहा है बुझ रहा है
मेरे दरयाओं को 'कैसर' इशारा कौन दे गा
- कैसर
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नुसरत फ़तेह अली खान
Sunday, January 3, 2010
यह जफ़ा-ए-गम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा
वोह नजाते दिल का आलम
तेरा हुस्न दस्त-ए-ईसा
तेरी याद रूह-ए-मरियम
दिलों जाँ फ़िदा-ए-राहें
कभी आके देख हमदम
सरकुए दिलफिगारा
शब-ए-आरजू का आलम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा.....
तेरी दीद से सिवा हैं
तेरे शौक में बहाराँ
वो चमन जहाँ गिरी है
तेरे गेसूओं की शबनम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा ...
लो सुनी गई हमारी
यूँ फिरे है दिल के फिरसे
वोही गोशा ए कफस है
वोही फस्ले गुल का मातम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा....
ये अजब कयामतें है
तेरी राहगुजर में गुजरा
न हुआ के मर मिटे हम
ना हुआ के जी उठे हम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा...
वोह नजाते दिल का आलम
तेरा हुस्न दस्त-ए-ईसा
तेरी याद रूह-ए-मरियम
दिलों जाँ फ़िदा-ए-राहें
कभी आके देख हमदम
सरकुए दिलफिगारा
शब-ए-आरजू का आलम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा.....
तेरी दीद से सिवा हैं
तेरे शौक में बहाराँ
वो चमन जहाँ गिरी है
तेरे गेसूओं की शबनम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा ...
लो सुनी गई हमारी
यूँ फिरे है दिल के फिरसे
वोही गोशा ए कफस है
वोही फस्ले गुल का मातम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा....
ये अजब कयामतें है
तेरी राहगुजर में गुजरा
न हुआ के मर मिटे हम
ना हुआ के जी उठे हम
यह जफ़ा-ए-गम का चारा...
- फैज़ अहमद फैज़
Saturday, January 2, 2010
कटे नाहि रातें मोरी... पिया तोरे कारन कारन.... पिया तोरे कारन कारन
कटे नाहि रातें मोरी..... पिया तोरे कारन कारन ....
.....पिया तोरे कारन कारन...
कालें कालें बादल छायें... देखि देखि जी ललचाये ....
कालें कालें बादल छायें.... देखि देखि जी ललचाये .... कैसे आऊ पास तिहारे ... दुरी गए मोरे साजन
कैसे आऊ पास तिहारे ... दुरी गए मोरे साजन.....
......दुरी गए मोरे साजन...
कटे नाहि रातें मोरी..... पिया तोरे कारन कारन .... पिया तोरे कारन कारन
भीगा भीगा मौसम आया .... पिया का संदेसा लाया...
भीगा भीगा मौसम आया .... पिया का संदेसा लाया...मनिवा को चैन न आवैं ... तरसें है मोरे नैना
मनिवा को चैन न आवैं ... तरसें है मोरे नैना
... तरसें है मोरे नैना .........
कटे नाहि रातें मोरी..... पिया तोरे कारन कारन .... पिया तोरे कारन कारन
कटे नाहि रातें मोरी... पिया तोरे कारन कारन.... पिया तोरे कारन कारन
.. पिया तोरे कारन कारन ....
.....पिया तोरे कारन कारन...
कटे नाहि रातें मोरी..... पिया तोरे कारन कारन ....
.....पिया तोरे कारन कारन...
कालें कालें बादल छायें... देखि देखि जी ललचाये ....
कालें कालें बादल छायें.... देखि देखि जी ललचाये .... कैसे आऊ पास तिहारे ... दुरी गए मोरे साजन
कैसे आऊ पास तिहारे ... दुरी गए मोरे साजन.....
......दुरी गए मोरे साजन...
कटे नाहि रातें मोरी..... पिया तोरे कारन कारन .... पिया तोरे कारन कारन
भीगा भीगा मौसम आया .... पिया का संदेसा लाया...
भीगा भीगा मौसम आया .... पिया का संदेसा लाया...मनिवा को चैन न आवैं ... तरसें है मोरे नैना
मनिवा को चैन न आवैं ... तरसें है मोरे नैना
... तरसें है मोरे नैना .........
कटे नाहि रातें मोरी..... पिया तोरे कारन कारन .... पिया तोरे कारन कारन
कटे नाहि रातें मोरी... पिया तोरे कारन कारन.... पिया तोरे कारन कारन
.. पिया तोरे कारन कारन ....
.....पिया तोरे कारन कारन...
Tuesday, December 29, 2009
हिजाब को..
हिजाब को..
हिजाब को बेनकाब होना था....
हिजाब को बेनकाब होना था
हाँ मुझी को...
मुझी को...
हाँ मुझी को ख़राब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
खेली बचपन में आँख मचोली बहोत
खेली बचपन में आँख मचोली बहोत....
खेली बचपन में आँख मचोली बहोत
आया शबाब...
आया शबाब तो हिसाब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
साथ रहते हैं रात दिन की तरह
साथ रहते हैं रात दिन की तरह
साथ रहते हैं रात दिन की तरह.....
तुम हो माहताब...
तुम हो माहताब मुझे आफताब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
मेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
मेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
मेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
हुस्न को...
हुस्न को लाज़वाब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
था मुक़द्दर में हमारा मिलना
था..था मुक़द्दर में हमारा मिलना...
था मुक़द्दर में हमारा मिलना..
वगरना हममें...
वगरना हममें कहाँ कामयाब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था ,
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
हिजाब को बेनकाब होना था
हाँ मुझी को ख़राब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
हिजाब को बेनकाब होना था....
हिजाब को बेनकाब होना था
हाँ मुझी को...
मुझी को...
हाँ मुझी को ख़राब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
खेली बचपन में आँख मचोली बहोत
खेली बचपन में आँख मचोली बहोत....
खेली बचपन में आँख मचोली बहोत
आया शबाब...
आया शबाब तो हिसाब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
साथ रहते हैं रात दिन की तरह
साथ रहते हैं रात दिन की तरह
साथ रहते हैं रात दिन की तरह.....
तुम हो माहताब...
तुम हो माहताब मुझे आफताब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
मेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
मेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
मेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
हुस्न को...
हुस्न को लाज़वाब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
था मुक़द्दर में हमारा मिलना
था..था मुक़द्दर में हमारा मिलना...
था मुक़द्दर में हमारा मिलना..
वगरना हममें...
वगरना हममें कहाँ कामयाब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था ,
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
हिजाब को बेनकाब होना था
हाँ मुझी को ख़राब होना था
हिजाब को बेनकाब होना था , हिजाब को ...
Monday, December 28, 2009
बात करनी मुझे मुश्किल
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसे अब है तेरी महफ़िल, कभी ऐसी तो न थी
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-करार
बेकरारी तुझे ऐ दिल, कभी ऐसी तो न थी
उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
के तबीअत मेरी माइल, कभी ऐसी तो न थी
चश्मे-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई कातिल, कभी ऐसी तो न थी
क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फर' से हर बार
ख़ु तेरी हुरश्माइल, कभी ऐसी तो न थी
- बहादुरशाह ज़फर
जैसे अब है तेरी महफ़िल, कभी ऐसी तो न थी
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-करार
बेकरारी तुझे ऐ दिल, कभी ऐसी तो न थी
उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
के तबीअत मेरी माइल, कभी ऐसी तो न थी
चश्मे-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई कातिल, कभी ऐसी तो न थी
क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फर' से हर बार
ख़ु तेरी हुरश्माइल, कभी ऐसी तो न थी
- बहादुरशाह ज़फर
Sunday, December 27, 2009
कैसे छुपाऊं..
कैसे छुपाऊं राजे-गम, दीदा-ए-तर को क्या करूँ
दिल की तपिश को क्या करूँ, सोजे-जिगर को क्या करूँ
शोरिशे-आशिक़ी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूँ
ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूँ बसर
सब ये क़ुबूल है मगर, खौफे-सहर को क्या करूँ
हाल मेरा था जब बतर, तब न हुई तुम्हें खबर
बाद मेरे हुआ असर, अब मैं असर को क्या करूँ
- हसरत मोहानी
दिल की तपिश को क्या करूँ, सोजे-जिगर को क्या करूँ
शोरिशे-आशिक़ी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूँ
ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूँ बसर
सब ये क़ुबूल है मगर, खौफे-सहर को क्या करूँ
हाल मेरा था जब बतर, तब न हुई तुम्हें खबर
बाद मेरे हुआ असर, अब मैं असर को क्या करूँ
- हसरत मोहानी
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Monday, December 21, 2009
खामोश हो क्यों
खामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
बिस्मिल हो तो कातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते
वहशत का सबब रौजने-ज़िंदा तो नहीं है
मेहरो-महो-अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते
एक यह भी तो अंदाजे-इलाजे-गमे-जाँ है
ये चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते
रहजन हो हाजिर है मताए-दिलो-जाँ भी
रहबर हो तो मंजिल का पता क्यूँ नहीं देते
मुंसिफ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते
साये हैं अगर हम तो हो क्यों हमसे गुरेजाँ
दीवार अगर हैं तो गिरा क्यूँ नहीं देते
क्या बीत गयी अबके 'फ़राज़' अहले चमन पर
याद आने का कफस मुझको सदा क्यूँ नहीं देते
- अहमद फ़राज़
Sunday, December 20, 2009
फैज़
हमके ठहरे अजनबी कितनी मुलाकातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद
कब नज़र में आएगी बेदाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
थे बहोत बेदर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क के
थी बहोत बे-मेहर सुबहें मेहरबान रातों के बाद
उनसे जो कहने गए थे 'फैज़' जा सदका किये
अनकही ही रह गयी वोह बात सब बातों के बाद
- फैज़ अहमद फैज़
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद
कब नज़र में आएगी बेदाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
थी बहोत बे-मेहर सुबहें मेहरबान रातों के बाद
उनसे जो कहने गए थे 'फैज़' जा सदका किये
अनकही ही रह गयी वोह बात सब बातों के बाद
- फैज़ अहमद फैज़
यह कौन आता है तनहाईओ में..
यह कौन आता है तनहाईओ में जाम लिए
दिलोंमे चांदनी रातोंका एहतमाम लिए
चटक रही है किसी याद की कली दिलमें
नजर में रख्श-बहारांओ की सुबह-ओ-शाम लिए
महक महक के जगाती रही नसीमे सहर
लबोंपे यार मसीहा नफ़ज़ का नाम लिए
किसी ख्याल की खुशबू किसी बदन की महक
दरे कफस के खड़ी है सबा पयाम लिए
बजा रहा था कहीं दूर कोई शहनाई
उठा हूँ आंखोंमे एक ख्वाब नातमाम लिए
- मखदूम मोहिउद्दीन
दिलोंमे चांदनी रातोंका एहतमाम लिए
चटक रही है किसी याद की कली दिलमें
नजर में रख्श-बहारांओ की सुबह-ओ-शाम लिए
महक महक के जगाती रही नसीमे सहर
लबोंपे यार मसीहा नफ़ज़ का नाम लिए
किसी ख्याल की खुशबू किसी बदन की महक
दरे कफस के खड़ी है सबा पयाम लिए
बजा रहा था कहीं दूर कोई शहनाई
उठा हूँ आंखोंमे एक ख्वाब नातमाम लिए
- मखदूम मोहिउद्दीन
Friday, December 18, 2009
इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई
शर-ओ-आइन पर मदार सही
ऐसे क़ातिल का क्या करे कोई
चाल जैसे कड़ी कमाँ का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई
बात पर वाँ जबाँ कटती है
वो कहें और सुना करे कोई
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई
न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई
रोक लो गर गलत चले कोई
बख्श दो गर ख़ता करे कोई
कौन है जो नही है हाजतमंद
किसकी हाजतरवा करे कोई
क्या किया ख़िज्र ने सिकंदर से
अब किसे रहनुमा करे कोई
जब तवक्को ही उठ गई 'ग़ालिब'
क्यों किसी का गिला करे कोई
-ग़ालिब
मराठी अनुरूप
पुत्र मेरीचा होऊन करे कोणी
माझ्या दुःखाचा उपाय करे कोणी
वाईटांचा कायदा वर अवलंब खरा
अश्या खुनीचे काय करे कोणी
चाल जशी ताणलेल्या धनुष्याचा बाण
हृदयात असा कि जाई करे कोणी
बोलल्यावर जीभ कापत आहे
ते सांगे आणि ऐकण करे कोणी
रटत राहत आहे वेड्यात काय काय
काही न समजो देवा! करे कोणी
न ऐको जर वाईट बोले कोणी
न बोलो जर वाईट करे कोणी
रोधून घ्या जर चुकीच चाले कोणी
क्षमा द्या जर अपराध करे कोणी
कोण आहे जो नाही आहे इच्छुक
कोणाची इच्छापूर्ती करे कोणी
काय केले खिज्रने सिकांदारास
आता कशास पथदर्शक करे कोणी
जेव्हा आशा ही उडून गेली 'गालिब'
का कोणाचा शोक करे कोणी
-गालिब
दिल-ए-नादाँ
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में जुबान रखता हूँ
काश पूछो क़ि मुद्दआ क्या है
जब क़ि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा-ए-खुदा क्या है
ये परीचेहरा लोग कैसे हैं
गम्जा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है
शिकन-ए-जुल्फ अंबरी क्यों है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है
सब्जा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज है हवा क्या है
हमको उनसे वफ़ा क़ी है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश क़ी सदा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैंने माना के कुछ नही ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
-ग़ालिब
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में जुबान रखता हूँ
काश पूछो क़ि मुद्दआ क्या है
जब क़ि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा-ए-खुदा क्या है
ये परीचेहरा लोग कैसे हैं
गम्जा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है
शिकन-ए-जुल्फ अंबरी क्यों है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है
सब्जा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज है हवा क्या है
हमको उनसे वफ़ा क़ी है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश क़ी सदा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैंने माना के कुछ नही ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
-ग़ालिब
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